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नज़्म
नहीं हर चंद किसी गुम-शुदा जन्नत की तलाश
इक न इक ख़ुल्द-ए-तरब-नाक का अरमाँ है ज़रूर
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मेरे मन के छेड़ने को मुझ से वो बैठेंगे दूर
मैं जो उलझूंगी तो पीतम मुस्कुराएँगे ज़रूर
मयकश अकबराबादी
नज़्म
देखें जो टॉफ़ियाँ तो वो हँसते ज़रूर हैं
बच्चों को रोते रोते हँसाती हैं टॉफ़ियाँ