नसीबों वालियाँ

असद मोहम्मद ख़ाँ

नसीबों वालियाँ

असद मोहम्मद ख़ाँ

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    स्टोरीलाइन

    यह दद्दी बाई नामी तवाएफ़ की कहानी है। उसके यहाँ बहुत सी लड़कियाँ रहती है, जिन्होंने अपनी सारी जमा-पूंजी दद्दी बाई के पास जमा करती रहती हैं। एक दिन दद्दी बाई मर जाती है और उसकी तिजोरी की चाबी उस इलाक़े के दारोग़ा के पास पहुँच जाती है। तिजोरी जब खोली जाती है तो उसमें से चंद रुपयों के अलावा कुछ भी नहीं निकलता है।

    सेहत के सिल्सिले में बहुत सों के अपने उसूल होते हैं... कुछ के नहीं भी होते। मम्मंद रियाज़ का ये था कि सवेरे जल्दी उठने वाला बंदा था। रोज़ वो म्युनिसिपल पार्क में शबनम से भीगी घास पे नंगे पाँव टहल ज़रूर लगाता था। कहता था इससे आँखों की “रोशनयाई” बेहतर होती है। ख़बर नहीं इस बेहतर रोशनी को वो ग्राहकों को पहचानने, उन पे कड़ी नज़र रखने के लिए इस्तेमाल करता था या उसका मक़सद इतना सादा और रोज़मर्रा जैसा नहीं, कोई बाक़ाएदा गहरा वजूदी मक़सद था मम्मंद रियाज़ का।

    जो भी हो।

    मम्मंद रियाज़ शबनम पे टहल लगा के अपने ठिकाने पे पहुंचने के लिए दद्दी बाई के चौबारे की साये साये निकल रहा था कि उसने रोने की आवाज़ें सुनीं।

    रात में किसी वक़्त सोते में मिघयाने वाली दद्दी बाई गुज़र गई थी।

    मम्मंद रियाज़ ने बात सुनी, समझी, फिर बाद में मौके़ मौके़ से कहने को ज़ेह्न में एक अच्छा सा फ़िक़रा बना के उसे अपने अंदर फाइल कर लिया। वो बिरादरी वालों में बैठेगा तो दद्दी को अच्छे लफ़्ज़ों से याद करते हुए ये ज़रूर कहेगा कि देखो जी, अराम से गुजर गई दद्दी जी। नाँ नज़े का आलम हुआ जान कुंदनी हुई, अराम से सोंते सोंते गुजर गई। हाहा...! नेक रूहों ने ऐसे ही चले जाना होता है। मालिक सभों की शर्म रखे... ऑइल ले...! ओवल ले...! ये आख़िरी आवाज़ मम्मंद रियाज़ की डकारों की थी।

    पेट ख़ाली हो या भरा, वो ऊंची आवाज़ में बोलता हो या कुछ सोच रहा हो, मम्मंद रियाज़ हर लंबे फ़िक़रे, हर लंबी सोच के आख़िर में ऑइल ले! ओवल ले! करके नक़ली डकारें ज़रूर लेता था। ख़ैर। वो रोने की आवाज़ें सुन के ठिठका। दद्दी बाई का फ़्लैट लड़कियों का घर था। कोई मर्द ज़ात बड़ा बूढ़ा था नहीं। पड़ोस की नीलम बाई और उसके गुमाशते, उसी डकारों वाले मम्मंद रियाज़, ने फ़ौरन के चार्ज सँभाल लिया। दरोगों, पहलवानों को ख़बर कर दी गई। किसी ने जा के थाने में भी बता दिया। ज़ाब्ते की पाबंदी नहीं थी, ऐसे ही पड़ोस पिछवाड़े की मुरव्वत होगी कि भई हो सकता है पेटी उतार के करोशिए की टोपी सर पे मढ़ के फ़ातिहा के दो लफ़्ज़ पढ़ने हेड कांस्टेबल मियाँ गुल भी पहुंच जाए। दद्दी बाई की उसकी बरसों की आश्नाई थी।

    इन फ़्लैटों चौबारों का मालिक हाजी क़ासिम नूरू थोड़ी दूर पे अपनी दुकान में बैठा पुराने कपड़ों की गांठों का हिसाब कर रहा था... जो वो हर वक़्त करता रहता था।

    उसने एक दूर-दराज़ तमानियत के एहसास से ये ख़बर सूनी और अपनी चिन्दिया खुजाई। “अब जब कि दद्दी बाई मर गई है तो ये फ़्लैट उसके चंगुल से समझो आजाद है। तो अब इसका भी कुछ करेंगे इंशाअल्लाह।”

    मगर वो दीनदार और अमली आदमी भी था। इस फ़्लैट में एक मय्यत पड़ी थी और फ़्लैट ख़ाली कराने से पहले मय्यत को उसके सफ़र पर रवाना कराना ज़रूरी था। उसने ख़बर देने वाले से कहा, “देखो भाई जान! इधर जो कोई भी होवे उसको मेरा बोलो कि क़ासिम नूरू सेठ मय्यत गाड़ी का अने गुस्ल वाली का सबी इन्तिजाम कर देंगा। अबी फोन करता ऊँ। तुम लोग किसी को उधर मेवे शह भिजा के बस गौर कंद को बोल देव। क्या?”

    गोजरे वाली ख़िदमती मय्यत गाड़ी के उटंगे पैजामे और गजगजाई हुई घनी डाढ़ी वाले जवान वालंटियर को बता दिया गया कि किस बिल्डिंग से कनजरी की मय्यत उठाने की है। उसी ने ग़ुस्साल बुढ़िया को रिक्शे में बिठा के मक्रानी पाड़े से बिल्डिंग तक लाना था। क़ासिम नूरू ने रिक्शा के पैसे दिए थे। और भी पैसे देते हुए वालन्टियर से कहा था, “अब्बा सवाब का काम होएँगा। ये रोखड़ा सम्बॉल, गुसल वाली को कपड़ा काफूर दे दिला के बराबर सेट कर दे। फ़्लैट दिखा दे। क्या? पीछे छोटा मय्यत गाड़ी ले के पौंच जाना। छोड़ आना दद्दी बिचारी को।”

    हाजी क़ासिम नूरू ने छोटी मय्यत गाड़ी का इसलिए कहा था कि उसे मालूम था गिनती के छःआठ दरोग़े, पहलवान, कसबियों के भाई-बंद साथ जाएँगे। बाक़ी तो बिल्डिंग में औरतें ही औरतें हैं। उन्हें क़ब्रिस्तान तो नहीं जाना होगा। छोटी गाड़ी सही रहेगी। इसका “फ़ेयर भी कमती लगेंगा। क्या?”

    जब गाड़ी बिल्डिंग से चली तो काले डुपट्टे ओढ़े, घर के मलगजे कपड़ों में मलबूस कोठे वालियाँ और पिछवाड़े की कम हैसियत पाड़े वालियाँ रो रो के बैन करने लगीं कि हाय री दद्दी बाई तू क्यूँ चली गई, और कुछ देर को दिन के सोखते में भी बड़ी सड़क और साथ की गलियाँ और गलियारे आदमियों और आवाज़ों से ऐसे भर गए जैसे चिराग़ जले पे भर जाते होंगे।

    मय्यत गाड़ी भी ठंसाठंस भर गई थी। कुछ लोग खड़े थे और दो चार लटक भी रहे थे। अन्दर सीट पे ख़याली डकारें लेने वाले मम्मंद रियाज़ के बराबर बैठी एक औरत या लड़की... बीबी नगीना... रोए जाती थी। दूसरी औरतों के बरख़िलाफ़ उसका डुपट्टा ज़ाफ़रानी रंग का था। तो क्या हुआ?आदमी को वाक़ई दुख हो तो ज़ाफ़रानी रंग भी मातमी बन जाता है। पर वो जिसका नाम बीबी नगीना था, ख़बर नहीं क्यूँ रो रही थी? हालाँकि किसी की ऐसी कोई रिश्ते नातेदार भी नहीं थी।

    मय्यत गाड़ी के घनी डाढ़ी वाले वालंटियर ने गाड़ी में बैठी उस अकेली बाई जी को देखा तो दिल में कहा, “लाहौल वला... इन लोग को ये खबर नईं कि औरत का क़ब्रिस्तान में जाना मकरूह... या क्या है। लाहौल वला... कोई दीन-धर्म तो उन कंजरों का... ख़ैर जी हम कौन... भई हमें क्या।”

    एक मुर्दा और एक ज़िंदा बाई जी को लिए, बहुत से दलालों, साज़िंदों, तमाशबीनों और एक पुलिस वाले के साथ, इसने मेवे शा की सड़क पकड़ ली।

    दद्दी बाई मघियाने वाली के बगै़र फ़्लैट ऐसा हो गया जैसे किसी देहाती फ्लैग स्टेशन पर मुसाफ़िरों का छपरा। लड़कियाँ तीन रोज़ तक छिलकों, रद्दी काग़ज़ों, टूटे हुए कूज़ों की तरह रुलती, ठोकरों में लुढ़कती चीज़ें बनी रहीं। बहुत लोग आए, बैठे, दद्दी बाई को याद किया और अफ़सोस की शक्ल बनाए चले गए।

    आने वालों में दनदनाती हुई आने वाली एक हवा थी। वो अपने साथ बेचैनी और ख़ौफ़ और धूल मिट्टी लाई। इस धूल मिट्टी और ख़ौफ़ ने चीज़ों को ढक लिया। लड़कियों को मालूम था कि धूल मिट्टी से ढक दिया जाना दफ़न होना है।

    वो किसी के साथ दफ़न होना नहीं चाहती थीं।

    दद्दी के गुज़र जाने के चौथे दिन काम वाला लड़का फ़्लैट में आया तो उसका मुँह सूजा हुआ था। लड़कियों में एक... जमीला... ग़ुसुलख़ाने से हाथ मुँह धो कर निकल रही थी। उसने लड़के को देखा, हैरान होके बोली, “अबे ओ! तेरे मुँह को क्या हो गया?”

    लड़के का जी चाहा जमीला की बात का कोई जवाब दे। मगर वो रुकी खड़ी थी, उसने मुँह बना के ऊँ हूँ जैसा कुछ कह दिया।

    वो बोली, “क्या क़ूँ कूँ करता है मुर्ग़ी के?अबे बताता नहीं क्या हुआ?”

    लड़का झुँझला के बोला, “शैद की मक्खी ने काट लिया ना।”

    जमीला ने दाँत निकाल दिए। “ओए साले मिठड़े दिलदार! शहद की मक्खी भी काटती है तेरे को?”

    एक और लड़की ने उस ना वक़्त मस्खरेपन पे मुँह बनाया। तीसरी, जो बाहर जाने की तैयारी कर रही थी, मुस्कराने लगी। कोई एक, जो पर्दे के पीछे सब सुन रही थी, खी खी करके हंस दी।

    फ़्लैट चल पड़ा।

    जिसका जी चाहा काम-काज में लड़के का हाथ बटाने लगी।

    लड़के ने दद्दी बाई के तरीक़ पर घर चलाना शुरू कर दिया। मगर घर चलाने के लिए पैसे की ज़रूरत होती है। और पैसा सब दद्दी बाई के हाथ में रहता था। लड़कियों की रक्में, गहने-पाते भी सब वही संभाल के रखती थी... तिजोरी में।

    और तिजोरी का ऐसा था कि बिरादरी के कहे पे कफ़न-दफ़न से पहले ही उसकी चाबी मीना दरोग़े के पास अमानत रखा दी गई थी। मीना समेत सब का कहना था कि तार दे दिया है, दद्दी के भाई बशीर को लेने दो। तब ही सब मिल के कोई फ़ैसला करेंगे और तिजोरी खोलेंगे।

    मगर अब ये मसला भी था कि जब तक तिजोरी नहीं खुलती रोज़ के ख़र्च के पैसे कहाँ से आएँगे। तीन दिन तक तो खाने का इंतिज़ाम आपी आप होता रहा। कभी नीलम बाई ने, नाजो ने और सीबे पहलवान ने, कभी मीना दरोग़े ने या कश्मीरी होटल वाले सेठ ने फ़्लैट पर खाना पहुंचवा दिया। ठीक भी था। मौत-मय्यत के घर में चूल्हा कैसे जलता?

    गुलाबो ज़नाना, जो कभी महीने-पंद्रह दिन में ताली फटकारता जाया करता था, एक दिन तो वो भी मुसाफ़िरख़ाने वाले होटल से आलू पूड़ी बिरयानी की छोटी देग़ उठवा लाया। दो वक़्त वो बिरयानी चल गई। पर अब ग़मी के खाने आना बंद हो गए थे। फ़्लैट को वापस अपने रूटीन पे आना था।

    एक लड़की बालो के पास सौ सवा सौ रुपये पड़े थे। पड़े क्या थे, छुपा रखे थे उसने। जब दोपहर के खाने की बात चली तो उसने सौ का नोट उधार के नाम से लड़के को पकड़ा दिया। वो क़ीमा, सब्ज़ी, तेल, प्याज़ सब ले आया।

    पैसे देते हुए लड़की बालो ने सोचा था कि रानी, रोज़ी, चंपा और नगीना को भी पैसे ढीले करना चाहिए थे। और ये जमीला अब तक बच्ची क्यूँ बनी हुई है? उसके पास ख़ुद अपने पैसे भी तो होंगे।

    दिन भर में कुछ नहीं कुछ नहीं तो बीस रुपये की तो सिर्फ़ रोटियाँ आएँगी।

    फिर उसने रानी के बारे में सोचा जो किसी को बताए बगै़र सवेरे ही निकल गई थी। बालो ने ख़ुद अपनी आँखों से देखा था नीचे सलेटी रंग की ऊपल रकॉर्ड में बैठ रही थी रानी। साथ में वो था डकारों वाला बे-ग़ैरत मम्मंद रियाज़, चिकन का गुलाबी कुरता पहने। शर्म तो आती नहीं इन बे-पैरों को। दद्दी जी को गुज़रे अभी चौथा दिन है कि उन्होंने बुढ़िया के कोठे पर हाथ डाल दिया। थूक है! एक दो दिन तो रुक जाते बे सबरे। फिर जैसी सब की सलाह होती। मगर उन बे-ग़ैरतों को किस बात की शर्म-मुरव्वत।

    एक बालो ही क्या सब झुँझलाने लगे थे। चंपा ने नाशते के बाद तैयार होना शुरू कर दिया था। उसने सबके साथ मस्का बन खाया था, चाय पी थी। किसी को शक भी नहीं था कि अब ये बाहर जाएगी। कपड़े बदल के उसने जमीला से ऑरेंज के किसी शैड की लिपस्टिक मांगी, क्योंकि ये जोड़ा उसका ऑरेंज के शैड में था। रोज़ी बोली, “ये तो दद्दी जी को विज़िट करने मेवे शा जा रही होगी जो ऑरेंज लिपिस्टिक मांगती है कुतिया?” इस पर गालियाँ बकती चंपा पंजे खोल के झपट पड़ी। बालो ने कोली डाल के बड़ी मुश्किल से उसे अलग किया। ऊँची आवाज़ में गालियाँ निकालती चंपा फ़्लैट की सीढ़ियाँ उतर गई।

    लड़के ने सोचा, “लो जी। फ़्लैट अब सई से चल पड़ा।”

    बावर्चीख़ाने की पेढ़ी पर बैठ के सब्ज़ी काटते हुए लड़की बालो उस कड़वी पन का हिसाब करने लगी जो दद्दी की मौत के चौथे दिन धीरे धीरे फ़्लैट में रीलीज़ हो रहा था।

    दिन डूबने से पहले एक बड़े भारी ट्रांसपोर्टर का बेटा टमी, जो हर दूसरे तीसरे दिन आया करता था, दद्दी जी की मौत के एहतिराम में विस्की लगाए बगै़र ख़ामोशी से फ़्लैट में आया और सर झुका के बैठ गया। वो दद्दी जी की याद को एक तरह का ख़राज-ए-अक़ीदत पेश करने के लिए टी शर्ट जीन्ज़ की बजाए आज कढे हुए गले का कुरता और चूड़ीदार पाजामा पहन के आया था। कुरता सच्ची बोस्की का और पाजामा पाँच फली मार्का लठ्ठे का था। भारी ट्रांसपोर्टर के बेटे टमी ने आज अपनी चाबी वाले सोने की ज़ंजीर भी नहीं घुमाई थी, जैसी कि उसकी आदत थी, बल्कि वो मस्नूई, अहमक़ाना उदासी में पहले दस पाँच मिनट ख़ामोश बैठा, फिर अपने छोटे छोटे जाहिलाना फ़िक़्रों में धीरे-धीरे समझाने लगा कि ज़िंदगी का यही है। फिर उसने इस बात पर ज़ोर दिया कि लड़की रोज़ी को और सबको अपना दिल बहलाने की ज़रूरत है। आख़िर में वो रोज़ी को इस पर आमादा करने में कामयाब हो गया कि वो खुली हवा में ज़रा निकले, ऐसी बंद-घुटी हुई जगह में मुस्तक़िल बैठी रही तो ख़ुदा करे बीमार पड़ जाएगी। रोज़ी ने बालों में झपाझप कंघा फिराया, फिर वो गिरे कलर की रेशमी शाल लपेट के हवा में आहिस्ता से बोली, “जमीला! मैं अभी आती हूँ, परेशान होना”, और भारी ट्रांसपोर्टर के बेटे टमी के साथ फ़्लैट की सीढ़ियाँ उतर गई।

    बालो ने अंदर ही अंदर दाँत पीसते हुए टम्मी को खुली मर्दाना गालियों से याद किया मगर फिर उसने सोचा कि वो सबसे इस तरह क्यूँ भिड़े जा रही है। उसने कौन सा दद्दी की याद का और ग़मी मातमी का या फ़्लैट का ठेका ले रखा है। ताया बशीर जाए, दद्दी ने उसका जितना जो तिजोरी में संभाल के रखा है, लेगी और निकल जाएगी। वो क्या कहते हैं कि, मुल्क-ए-ख़ुदा तंग तो नहीं है।

    बालो उठी, लड़के से कह के बाहर चली गई कि वो नाजो की बैठक से अभी होके आती है। लड़के ने बालो को जवाब में सिर हिला के “हाँ” कहा और लाउंज में बिछी चौकी के पास खड़ा हुआ। चौकी पर बीबी नगीना जैसे सन्नाटे में बैठी थी। आँसुओं ने बह-बह के उसके गालों पे लकीरें सी बना दी थीं।

    दद्दी जी के गुज़रने के बाद वो अब नगीना बीबी को रोते होए देख रहा था। लड़का ख़ामोशी से चौकी पर बैठ गया। फिर उसने अपना काला और मेहनत के काम से कटा फटा बदसूरत हाथ नगीना बीबी के शाने पे रख दिया।

    “रोना नईं चय्ए!” उसने कहा और ख़ुद भी रोना शुरू कर दिया।

    *

    अगले दिन अभी सब सो ही रहे थे कि दो टैक्सियों में बशीर दरोगा का सामान, वो ख़ुद, उसकी शागिर्दें और नौकर पहुँच गए।

    लड़कियों ने बशीर दरोग़े को ताया कहना सीखा था। क्या करतीं। ढीले-ढाले कपड़े पहने, ख़ूब घुट के तुंड कराए हुए सवा छःफ़िट के उस चमकते हुए काले आदमी को, जो किसी का चचा-ताया कुछ भी नहीं लगता था, लड़कियाँ उस वक़्त भी ताया कहती हुई आगे बढ़ गईं।

    दरोगा ऊंची आवाज़ में बात करने का आदी था, टैक्सी वालों से झगड़ते उसे मख़मा दूला के तनूर तक सुना जा सकता था। जब तक एक एक संदूक़ और डिब्बा, एक एक शागिर्द ऊपर पहुंचा दी गई दरोगा अपना रेशमी तहबंद कूल्हों तक समेटे, नौकरों को और साथ आई लड़कियों को ऊंची आवाज़ में हिदायतें और धमकियाँ देता रहा कि ओए गिराना नईं, तोड़ना नईं! मैं मार के सुट दियाँगा।

    दरोग़े के शोर शराबे के दौरान सड़क के बाएं रुख़ की पुरानी बिल्डिंग के पहले माले पे एक खिड़की खुली, खिड़की से मेहंदी लगा एक सर बरामद हुआ। सर वाले ने आवाज़ लगाई, “हाँ दरोगा! गया बई?” बशीर दरोग़े ने अपना शोर-शराबा रोक के मेहंदी सर वाले को देखा, ठठ्ठा मार के जवाब दिया, “हाँ बई मीना दरोगा! गए।” ये कहते हुए उसके लहजे में बड़ी मसर्रत थी।

    मीना ने जवाब में कहा, “बिस्मिल्लाह बिस्मिल्लाह!” और सर अंदर कर लिया।

    बशीर ने रुख़ बदल के उसी पहले वाले ज़ोर-शोर से नौकरों और शागिर्दों को डाँटना शुरू कर दिया।

    बाद में फ़्लैट में एक ही क़दम जो रखा तो बशीर पर जैसे ग़म का पहाड़ टूट पड़ा। उसका क़द छः फ़िट का रह गया और आवाज़ को जैसे सिंदूर लग गया। फ़्लैट के दरवाज़े पर उसे जमीला खड़ी मिल गई तो उसने उसके सर पे अपना भारी सियाह पंजा रखा और कमज़ोर आवाज़ में बैन करना शुरू कर दिया कि “आपाँ जी क्यूँ चली गई। अब इस मसूम का क्या होगा?”

    बालो दरवाज़े की ओट में खड़ी हुई थी। उसने रानी की तरफ़ देख के आहिस्ता से फ़िक़रा लगाया, “होगा क्या! ताया भैंसा गया है, फिर नथ उतरवाई कराएगा धूम से।”

    दरोग़े से रानी मिला के रखना चाहती थी। उसने बालो को घूर के देखा और डुपट्टा सर पे लेकर ग़म में डूबे हुए दरोग़े को आदाब किया, हाथ थाम के उसे चौकी तक पहुँचाया।

    दरोग़े ने शफ़क़त ज़ाहिर करते हुए बालो के सर पर भी हाथ रखा, बोला, “जीती रह बच्ची जीती रह। तुम सब निक्की निक्की चिड़ियों ने कैसे झेला होगा ये ग़म का पहाड़? हाय?”

    सब चौकी के सामने गई थीं। लड़की रोज़ी को आते देर हो गई। ताए ने देखा कि एक रह गई थी वो अब रही है। उसने कंधे पर पड़ा तौलिया मुँह पे डाल लिया। तौलिए में से बोला, “रोज़िए! पूत्तर! ओए क्या करें? क़िदर जाएँ? क्या करें नी?”

    बालो ने रानी के कान में कहा, “मौज बहाराँ!” और बालकनी की तरफ़ निकल गई।

    बशीरे ने अब काम वाले लड़के को देखा, “तूँ कौन है बई?”

    रानी ने बताया कि ये काम वाला लड़का रफ़ीक़ है। दद्दी जी उससे बड़ा लाड करती थीं। भैंसे ने लड़के को चुमकारा, अपने पास बुलाया। वो नई जगह पहुंच कर अपने हमनवा बनाने की अहमियत समझता था। कहने लगा, “जो आपाँ जी का लाडला वो अपना लाडला। क्या नाम बताया था पुत्तर?”

    “रफ़ीक़।”

    “अच्छा तो रफीक पुत्तर! बज़ार से सौदा सुल्फ़ तूँ लाता है?”

    “हाँ साब।”

    “होऊँ।” दरोग़े ने पुर ख़याल अंदाज़ में अपने कुर्ते के नीचे पहने शलोके की जेबें टिटोलनी शुरू कीं। सौ का एक नोट निकाला, लड़के की तरफ़ बढ़ाते होए बोला, “ले पुत्तर! ये सँभाल। ये नोट है सौं का। घर में इस वक़्त बंदे हैं छः ते छः बाराँ और एक तूँ। बई जा, तीराँ बन ले के आ। फटाफट... काग़ज़ की थैली में मिलते हैं वो मोटे वाले बन। और बई एक... नाँ डेढ़ सैर ले के आदईं... जा हाँ, ले आ... फिर झपट के नाशता कर लियाँगे।”

    लड़का “अच्छा साब!” कह के बर्तन लाने किचन की तरफ़ जाता था कि दरोगा ने पूछा, “ओ क्यूँ बई काके! कन्नी एक दुकानाँ हों गी उधर दुध दईं की?”

    लड़का बोला, “पता नहीं तीन चार देखी हैं मैंने।”

    इस जवाब से दरोग़े की तशफ़्फ़ी नहीं हुई तो वो बड़बड़ाने लगा कि भई शहर के दूध-दही पे एतिबार कोई नहीं किया जा सकता... भावीं शहर कोई भी हो। फिर बोला कि चल पुत्तर, मैं देखूं कैसा दूध-दही देते हैं, क्या करते हैं इधर के दुकानदार!

    लड़का दही के लिए बर्तन और बनों के लिए थैली ले के चला तो दरोगा भी जूतियाँ पहन के साथ हो लिया।

    बाहर आया तो वो बड़ी सड़क पर लड़के के पीछे कुछ दूर चला। लड़के ने उसे इशारे से दूध-दही की दुकानें दिखाई दीं। दरोग़े ने पसंदीदगी में सर हिलाया। फिर अचानक याद गया कि उसे नहाने का साबुन लेना है। वो बोला, “ले बई पुत्तर दुकानें तो ठीक ही हैं। तू दईं ले, बन ले। मैं उधर से साबुन पकड़ लूँ...चंगा?”

    लड़का दही लेने चला और दरोगा तेज़ी से क़दम बढ़ा के सड़क पार कर गया। पहले उसने इधर-उधर, फिर दद्दी की बालकनी पर नज़र डाली। बालकनी ख़ाली थी। उस तरफ़ लड़का भी कहीं नहीं था। दरोगा तेज़ी से उस पुरानी बिल्डिंग में दाख़िल हो गया जिसके पहले माले की खिड़की से मैंने अपना लाल सर निकाल के उसे बिस्मिल्लाह कही थी। बशीर दरोगा मीना की बैठक पर ज़्यादा से ज़्यादा पाँच मिनट रुका होगा। पुरानी बिल्डिंग से निकलते हुए उसने फिर दाएँ-बाएँ देखा और सड़क पर गया। सड़क पार करते हुए उसने दूध-दही की दुकानों की तरफ़ ताका। लड़का अब भी सामने नहीं था। दरोगा फ़्लैट की तरफ़ चलने लगा तो उसे लड़का दिखाई दिया। वो इंतिज़ार करने लगा। ये सही है! दरोगा बशीर ने इत्मिनान में सर हिलाया। वो दोनों साथ निकले थे, साथ लौट रहे हैं।

    नाश्ते से पहले दरोग़े ने तौलिया उठा ग़ुसलख़ाने की राह ली। उसे याद था कि उसने लड़के से साबुन ख़रीदने की बात कही थी तो अब उसने उसे और सबको सुना के कहा कि भई ये बाज़ार भी ख़ूब है। उधर काम की चीज़ भावीं नाँ ना हो, फ़ैशन की चीज़ाँ बहुत नज़र आती हैं। “ओ पुत्तर बालू! जय कोई लाल साबुन, कोई सनलेट पड़ा होवे तो दे दईं। शाबाश!”

    नहाने के बाद बशीर दरोगा काले बदन पर लंबा तौलिया लपेटे ग़ुसलख़ाने से निकला और अपने किसी नौकर जीवी को ज़ोर ज़ोर से पुकारता दद्दी के कमरे में घुस गया। अंदर पहुँच के भी वो बराबर आवाज़ें देता रहा, “ओला ओए जीवे! मेरे कपड़े लिकाल दे।”

    जीवा तेज़ तेज़ चलता हुआ आया। कुछ देर दरोग़े के अंदर पड़े ट्रंकों, सूटकेसों में खड़बड़ करता रहा, कमरे से बाहर गया, कि बशीर दरोगा की आवाज़ सुनाई दी। “बूहा बंद कर के जाएँ ओए... मैं कपड़े पाना आँ!” जीवा दरवाज़ा बंद कर गया।

    दद्दी की लड़कियाँ और ताया बशीर की शागिर्दें प्लास्टिक बिछा के प्लेटों में चमचे भर भर के दही डालने और काग़ज़ की थैलियाँ फाड़ फाड़ के फ़ुरुट बन निकालने लगीं।

    दरोगा किसी भी तरफ़ से मौसीक़ी का रसिया नहीं लगता था मगर उस वक़्त वो दद्दी के कमरे में रखा बड़ा रेडियो ख़ूब ज़ोर शोर से बजा रहा था।

    देर हो गई, बशीर दरोगा कपड़े बदल के नहीं आया तो लड़के ने दद्दी वाले कमरे का दरवाज़ा बजाया। “उस्ताद चा बनाऊँ? कि बाद में चा पियोगे?”

    अंदर से दरोग़े की झुंझलाई हुई सी आवाज़ आई, “नईं ओए चा-शा कोई नईं। बस दईं लिकाल ले... मैं आया।”

    और कोई पाँच सात मिनट बाद कत्थई रंग के कढ़े हुए कुरते और बोस्की कलर के तहबंद में इतर में भभकता हुआ बशीर ताया कमरा खोल के, “आओ बई जाओ बिस्मिल्लाह” कहता हुआ निकला और प्लास्टिक के

    दस्तरख़्वान पर उसने अपनी जगह संभाली।

    नाशते पे लड़कियाँ बिल्कुल ख़ामोश रहीं। हाँ दरोगा फ़ुरुट बनों की तारीफ़ करता और मेल-मोहब्बत और आपस के भाई चारे के फ़ज़ाइल बयान करता रहा और चप-चप करके मुँह चलाता रहा। दही के बारे में उस की राय महफ़ूज़ थी। दुकानें तो बड़ी शोशा वाली थीं पर कहने लगा कि ऐसी दुकानों पर दही कैसी होनी चाहिए, ये समझने में कुछ टाइम तो लगेगा ही।

    नाश्ते के बाद दरोगा ख़िलाल करता, डकार लेता बालकनी तक ही पहुंचा था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। छोटा-मोटा एक जुलूस फ़्लैट में दाख़िल होने को ज़ीने पर खड़ा था। मीना दरोगा, नाजो बाई, नीलम लुधियाने वाली और दूसरी बाईयां, मम्मंद रियाज़ और उस जैसी दो-तीन शक्लें, कश्मीरी होटल वाला और फैंसी हमाम ऐंड हेयर कटिंग सैलून का मालिक नवाज़ दीन अंदर गए।

    इतने बहुत से लोग, ये सारे पड़ोसी और बिरादरी के सर बुर आवुर्दा अफ़राद, दद्दी की मौत पर उसके ग़मज़दा भाई बशीर को पुरसा देने आए थे।

    दरोग़े ने लड़कियों को इशारा किया। मुजरे का कमरा... रोज़ी रोज़गार की जगह... ऐसे सोगवार इज्तिमा के लिए मुनासिब तो थी, मगर क्या हो सकता था। मुजरे वाला हाल खोल दिया गया। वहाँ लड़कियों ने हाल के आइनों पर मैली मलगजी चादरें, कम्बल टांग दिए थे और ब्रोकेड के ग़िलाफ़ खींच के नंगे सोगवार तकिए बेतर्तीबी से इधर-उधर डाल दिए थे। दरोगा ने पसंदीदगी में सर हिलाया। उजली चाँदनी पर सब आने वाले बैठ गए। उन्होंने दोनों दरोगों, बशीर और मेहंदी सर वाले मीना को इसरार कर के सदर में बड़े गाव तकिए के साथ बिठाया था। हालाँकि बशीरा और मैने दोनों इन्किसार से काम लेते हुए हाथ जोड़ते और इसरार करने वालों के पैरों की तरफ़ हाथ बढ़ा कर अपनी आजिज़ी ज़ाहिर करते थे। फिर भी वो उस एक ही तकिए से टेक लगा के एक दूसरे से भिड़ के बैठ गए और आपस में उस आख़िरी मुलाक़ात को याद करने लगे जब “आपाँ, अल्लाह बख़्शे ज़िंदी थी।”

    मीना दरोगा बोला, “यार बशीर भाई! आप दुबला गए, अब डेढ़ बरस पीछे देखता हूँ आपको तो बहुत ही कुछ फर्क लगता है।”

    बशीर बोला कि “टे सभी को ख़राब करता है दरोगा। मैं जो अभी फ़ुट पैरी पे खड़ा सामान समेटता था और आपने अपनी खिड़की से झांक के सलाम दुआ की थी तो सच्ची बात है फ़ौरी में तो मीना भाई! मैं आपको पिछान नईं पाया।”

    मीना कहने लगा, “कैसे भला?”

    बशीर मीने की तरफ़ घूमा, यानी अपनी गैंडा गर्दन के साथ जितना भी घूम सकता था और बोला, “बई ये लाल सर तो कभी नईं देखा था आप का।”

    मीना मुरव्वत में हाहा कर के थोड़ा हंसा। “क्या करें भाई बशीर! हम तो अब बूढ़ी घोड़ियों में गिने जाने लगे... तो बस, लगाम को तो फिर लाल रंगना ही रंगना था। हाहाहा!”

    हम्माम वाला नवाज़ दीन अपनी दुकान पे गाहक छोड़ के आया था, उसने दरोगों की वक़्त गुज़ारी बातचीत बीच से उचक ली। बोला, “बड़ा अफ़सोस हुआ जी दद्दी बाई के फ़ौत होने का सुन के। अल्लाह मग़फ़िरत करे।

    मैं उस रोज़ दुकान पे नहीं आया था वर्ना जाता मिट्टी देने।”

    नवाज़ दीन ने पहल की तो सब आने वालों ने फ़र्दन-फ़र्दन बशीर दरोग़े को दद्दी का पुर्सा दिया। सड़क की औरतों ने जो सर ढकते हुए अपने डुपट्टों को कानों के पीछे इतना उड़स के आई थीं कि पेशानियों का भी कुछ हिस्सा ढक गया था, हल्की आवाज़ में थोड़ा रो कर दिखाया, फिर चुप हो गईं। पुर्सा देते हुए पड़ोसी और सब बिरादरी वाले बड़े फ़िक्रमंद और नेक दिखाई देने लगे और पुर्सा लेते हुए दरोगा बशीर ऐसा मज़लूम और सताया हुआ बन गया जैसे मौत उसी को सताने के लिए ईजाद की गई है। उसका क़द और भी तीन इंच घट गया और आवाज़ में फिर सिंदूर बैठ गया।

    पुर्से का सिलसिला ख़त्म हुआ तो मीना दरोग़े ने खंखार कर गला साफ़ किया और दद्दी वाली लड़कियों के उमूमी जत्थे की तरफ़ देख कर कहा, भई बिरादरी के लोगों और पड़ोसियों-पंचों ने मेरे पे ज़िम्मेवारी डाली थी तिजोरी की चाबी की, तो मैंने ये बोल दिया था कि असल तो दरोगा बशीर ने ही सब देखना भालना है... तो जी मैंने इधर तार दिलवाया दिया था बशीर भाई को और वख़्ती तौर पर... समझो जब ही तक असल वारिस नहीं आवे... ये चाबी अपने पास रख छोड़ी थी। अगर नहीं रखता तो दस तरह के झगड़े टंटे होते। उधर दद्दी जी के पास अमानतें भी रखी हैं... और भी सब कुछ है। इसलिए भय्या! चाबी सम्बॉल के मैं जो इधर से गया था तो फ़्लैट की तरफ़ अब आया हूँ। मैंने अपने को बोला था कि मैने बाशा, बेहतरी तेरी इसी में है कि अभी जब तक दद्दी का असल वारिस नहीं जावे तो फ़्लैट की सीढ़ी मत चढ़ना, किसलिए कि तेरे पास तिजोरी की चाबी है। किधर से कोई इल्ज़ाम बोहतान नहीं बन जावे... तो अब सब बिरादरी वालों, पड़ोसियों की साक्षी में... भय्या! ये लो... मैंने ज़िम्मेवारी अपनी पूरी कर दी... लो भई सम्बालो दद्दी जी की चाबी।”

    मीना ने बशीरे की तरफ़ चाबी बढ़ाई। उसने चाबी को हाथ लगाया। वो आँखें पटपटाने लगा, मानो अब रोने ही वाला है। मीना दरोग़े ने शाने पे उसके हाथ रख दिया। बोला, “ये समज ले बशीर चौधरी कि दुनिया का दस्तूर यही है। अब ये पग तेरे सर पे आई है।”

    फ़्लैट वालियों के हुजूम में खड़ी जमीला ने सबकी तरफ़ देखा, झुक के रोज़ी के कान में कहा, “दद्दी जी पग तो नहीं बांधती थी!”

    रोज़ी ने उसे सरगोशी में झिड़का, “बकवास नहीं कर।”

    उस वक़्त तक बशीर दरोगा सबके बेहद इसरार पर दद्दी जी की चाबी संभाल चुका था। तक़रीर की बारी अब उसकी थी। मगर वो देख रहा था कि हम्माम का प्रोप्राइटर नवाज़ दीन बेचैन है, जाना चाहता है। उसने सोचा नवाज़ दीन को फ़ारिग़ कर दूँ। बोला भाई नवाज़ दीन! आपने बड़ी शफ़क़त, बड़ी भाई बंदी दिख़ाई जो आप गए।”

    भाई-बंदी के लफ़्ज़ पर नवाज़ दीन का मुँह बन गया। वो ख़ुदा से चाहता था कि किसी और बाज़ार में ठीक सी जगह मिल जाए तो वो इस कंजर पाड़े से दुकान समेट के बस चला जाए। मगर ख़ैर, क्योंकि भाई कहते हुए दरोग़े की नियत नेक थी इसलिए उसने ख़ुद को तसल्ली दी और नीम क़द उठ के हाथ बढ़ा दिए। “अब इजाज़त दो दरोगा! दुकान पर गाहक छोड़ के आया हूँ।”

    कश्मीरी होटल वाले ने भी हाथ बढ़ा दिए। “मैं भी चलूंगा दरोग़े जी!”

    “बिस्मिल्लाह... ख़ैर होवे।” कश्मीरी होटल वाला और नवाज़ दीन चले गए तो लड़के ने उनके पीछे फ़्लैट का दरवाज़ा बंद कर दिया। अब सिर्फ़ बिरादरी के औरत-मर्द रह गए थे, सो बशीर ने आवाज़ को हलक़ में ही घूँट के उसमें आँसुओं की मिलावट की और रोते हुए सुरों में कहा कि रब जानता है आपाँ जी की चाबियां सँभालने का मैंने कभी सोचा भी नहीं था। “मैं तो समझता था कि मेरी चाबियाँ... मतलब मेरी ख़बर सुनेंगी आपाँ जी कि लओ बई बशीर गुजर गया... ख़ैर, तार भेजा था भाई मीना दरोग़े ने, मैं चल पड़ा। बिरादरी का हुक्म था, कैसे नईं आता। रब जानता है मुझे नईं पता इधर किराया बिजली-पानी गैस... इसमें मुझे पूरा भी पड़ेगा या इन मसूमों के साथ, जिनंहानों रेल चढ़ा के लाया हूँ, भुक्क मरना पएगा। तो जो बिरादरी का हुक्म। पर एक बात अभी साफ़ कर दूँ मैं। सारे भाई-बंद बैठे हैं... बशीर भूकों मर जाएगा पर जो कुछ आपाँ जी ने इधर मेल-जोल, घर-गृहस्ती, पैसा-कौड़ी बनाया है इसमें एक टेड्डी फुट का हक़ नईं मांगेगा बशीर। ये पक्की बात है।”

    जमीला ने किसी को मुख़ातिब किए बगै़र आहिस्ता से ख़ुद से कहा, “क्या बात है! ये दरोगा नहीं दरवेश है, हो हो हो।”

    दरोग़े की तक़रीर जारी थी। वो कह रहा था,

    “थोड़ा बहुत जमा पूंजी जो भी है वो साथ ले आया हूँ। किस लिए कि वापस नईं जाना। अब तो इसी ठिकाने पे बच्चियों के लिए काम तलाश करना है। और बच्चियाँ दद्दी जी की ये नईं समझें कि हम उनकी रोज़ी रोटी में रब करे कोई खंडित डालेंगे। नाँ नाँ बई नाँ। बशीर दरोग़े ने अपनी शागिर्दों को सिखलाया है कि पुत्तर दूजे लोक के रोटी रिज़्क पे नजर नईं डालनी। सबको अपनी पिशानी का लिखा कमाने खाने दो। जो जिसका उसी को मुबारक... जना कुछ काम, जो कला बशीर ने अपनी बच्चियों को सिखलाई है उनके लिए वो ही बस है... मालिक के करम से।”

    बशीर दरोग़े की तक़रीर का जो असर बिरादरी पे पड़ा हो वो बिरादरी जाने, दद्दी की अक्सर बच्चियों ने इत्मिनान का सांस लिया कि देखने में ताया बशीर भले ही ऐसा दर्शनी हो पर बर्तावे में ठीक-ठाक लगता है। ऐसी खरी बातें वही करता है जिसके दिल में खोट हो, अन्दर जिसके कोई घात लगाए ना बैठा हो। दद्दी जी ने उनका जो कुछ जमा-जोड़ा सँभाल रखा था ये भलामानुस नेक नियती से दे छोड़ेगा... मसला ही कोई नहीं। कुछ लड़कीयों ने तो उसी वक़्त फ़ैसला कर लिया कि ताय बशीर की शागिर्दों को यहाँ पाँव जमाने में मदद देंगी। ये भला आदमी अपना ठिया-ठिकाना छोड़ के इधर आया है, सिर्फ़ हमारी ख़ातिर। हम ऐसे भी गए गुज़रे नहीं कि उसकी शागिर्दों की थोड़ी बहुत मदद भी करें। अपनी तक़रीर अधूरी छोड़ के बशीर दरोगा अब आपां जी की और अपनी मोहब्बतों का कोई क़िस्सा सुना रहा था कि आपाँ जी ऐनुज ख़याल रखती थीं, ऐनुज करती थीं, कि उसने देखा लड़कीयाँ पहलू बदलने लगी हैं और मेहमानों में से कोई कोई जमाहियाँ लेता है। तो उसने किस्से लपेट लिए और बोला, “मैं अपने हवासों में नईं आँ... अभी एक अर्ज़ बिरादरी से करना है कि बई दस मिन्टी को होर रुक जावो। मैं तिजोरी खोल के जिस किसी का जो वे है बिरादरी के सामने हवाले कर देना चाहना। उसने लड़कीयों से पूछा, हैं नी बच्चियो! ये चाबी तिजोरी की है? हाँ भला?”

    दो तीन ज़नानी आवाज़ों ने जवाब दिया, “हाँ जी... तिजोरी की है।”

    “तौ फिर आइए... ये काम भी निमड़ जावे... बीबी नाजो! नीलम बाई...! तूँ मम्मंद रियाज़! मीना दरोग़े...! आओ जी... चलो... बेटी बालू, नगीना, चंपा बेटे... लिकल आओ इधर।”

    बशीर दरोगा उठा तो मीने दरोगा ने भी तकिया छोड़ दिया। मुजरे वाले हाल से पूरी बिरादरी पंचायत करती दद्दी बाई के कमरे में गई।

    बशीर दरोगा, इतर में बसा, नहाया धोया, काला पहाड़ सा, तिजोरी के क़रीब पहुंचा। उसने देखा कि बिरादरी के अहम लोग कमरे में गए हैं तो ऊंची आवाज़ में बिस्मिल्लाह कहके उसने चाबी लगाई और बड़ी

    अक़ीदत से, जैसे अपनी बख़शिश निजात का कोई फ़रीज़ा अंजाम दे रहा हो, चाबी घुमाई। फिर ज़ोर लगा के तिजोरी का हैंडल गिराया और लोहे का भारी पट खोल दिया।

    जैसी सब तिजोरियाँ होती हैं अंदर से ये तिजोरी भी वैसी ही थी, ग़ैर अहम सी। क्यूँकि असल में तो तिजोरी का ड्रामा उसके बाहर होता है। अंदर तो काग़ज़ात या उजले मैले नोटों की गड्डियाँ, कपड़े में लपेटे गए जे़वरात, उनके नए पुराने डिब्बे या एक आध कोई फ़ुज़ूल चीज़ पड़ी होती है जिसकी मार्किट वैल्यू सिफ़र हो... मसलन किसी प्यारे के सर से उतारी हुई बालों की लट, संदल की डिबिया में रखी किसी बहुत अज़ीज़, बहुत प्यारी जगह की मिट्टी...

    इस तिजोरी में भी ऐसा ही कुछ रखा था। ये नाटक-नौटंकी में इस्तेमाल होने वाला गत्ते और पन्नी और गोटे के टुकड़ों से बना मलिका का ताज था, जो आम बाज़ार में एक आने का भी बकता।

    बशीर दरोग़े ने ताज शाही को तिजोरी से निकाल दद्दी के बिस्तर पे रख दिया। ताज के नीचे पोस्टर थे, लाल-पीले-नीले रंगों में छपे हुए। किसी पुरानी ग्रामोफोन कंपनी का निशान था जिस पर काले धब्बों वाला सफ़ेद डब्ब खड़ब्बा कुत्ता भोंपू में मुँह दिए बैठा बड़े सुकून से कुछ सुन रहा था।

    तिजोरी के अंदर के ख़ाने से एक थैली निकली जिसमें सिक्के बजते थे। कमरे के लोगों में सनसनी दौड़ गई, हो हो अशर्फ़ियों की थैली है। थैली को बिस्तर पर उल्टा गया तो खुला कि जगह जगह के ताँबे और चांदी के सिक्के थे, चांदी के कम, ताँबे के ज़्यादा।

    थैली के साथ काग़ज़ों में लिपटे कुछ नोट मिले। ताए ने काग़ज़ अलग किया तो दस-दस के नोटों की एक गड्डी थी, एक सौ सौ के नोटों की। बहुत हुए तो पंद्रह नोट होंगे या बीस। मोटे कपड़े की एक और थैली भी मिली जिसमें चांदी की पुरानी झांजरें, देहाती किस्म के बाज़ूबंद, पाज़ेब और बिछवे भरे थे... चांदी के।

    इसके सिवा दद्दी की तिजोरी में कुछ नहीं था।

    बशीर दरोग़े ने तिजोरी के सब ख़ाने, फाटक, ढक्कन, पट सब भाटम भाट खोल दिए थे। फिर अपना इत्मिनान करने और कमरे के औरतों-मर्दों की तसल्ली के लिए उसने अपना काला हाथ तिजोरी में हर तरफ़ फिराया। अन्दर झांकते हुए उसने अपनी मोटी सियाह गर्दन इतनी झुका दी कि गर्दन के पीछे गोश्त के दो छोटे टावर से बन गए।

    तिजोरी में नज़रें और हाथ फिराने से फ़ारिग़ हो के बशीर दरोग़े ने नौशेरवां आदिल के से इंसाफ़ और कलबी की सी बेनियाज़ी से दुनिया का सामना किया। सबको अपना तारीक चेहरा दिखाते हुए बोला, “लओ बई ये पैसे, ज़ेवर है सब। जिस जिस का जिन्ना है बता दो ते चुक लओ... हाँ... उठा लो।”

    दरोग़े की भद्दी आवाज़ कमरे में मौजूद हर मर्द, हर औरत ने सुन ली, मगर इस आवाज़ में जो कुछ कहा गया था लड़कियों में से किसी की समझ में आया। नगीना के सिवा वो सभी ज़रा सा आगे झुक आई थीं ताकि जो कुछ सुनने, समझने, देखने से रह गया है, वो सुन, समझ, देख लें। मगर दरोग़े बशीर ने पूरी बात कह दी थी। आगे सन्नाटा था।

    आख़िर दाना चुगती चिड़िया की तरह आगे को झुक्की हुई बालो ने ज़रूरत से ज़्यादा बुलंद आवाज़ में दरोग़े को मुख़ातिब किया, हालाँकि वो उसके क़रीब ही खड़ी थी। कहने लगी, ताया बशीर! आप क्या कह रहे हैं...? बात समज नईं आई।

    शायद बालो भी दरोग़े की लाडली जैसी होगी, उसने बड़ी शफ़क़त से कहा, “निक्की! मैं ये बोलता हूँ कि बई जिसका जिन्ना वे होवे, चुक लओ। एक दूजे को पता तो है कि किन्ना किसका है। तौ फिर ले लो। सम्बालो अपनी अपनी चीज़ाँ।”

    रोज़ी हुजूम में रस्ता बनाती हुई दरोग़े बशीर तक पहुंच गई थी। उसकी आवाज़ इंतिहाई तशवीश में धीमी हो गई। “कौन सी चीज़ें? दरोगा! इधर क्या है? इधर तो कोई रक़म, कोई ज़ेवर नहीं दरोग़े जी! समझ नहीं आई।”

    दरोग़े को रोज़ी की बात से बड़ा अचंभा हुआ। ये रोज़ी काकी को क्या हो गया है...? क्या कह रई है ये मेरी बच्ची? उसने बुलंद आवाज़ में कहा, पुत्तर ये रक़म है, खबरे डेढ़ कि दो हज़ार से ज़्यादा। फिर ये बाज़ू बंद, पाज़ेब, बिछवे, झांजर... ये सब है मेरी जान!”

    रोज़ी को सब्र करना मुश्किल हो रहा था। चीख़ के बोली, “ओ ये हमारा नहीं है। अकेले मेरे ही चार सेट हैं... सोने के... भारी भारी। और दस-बाराँ हज़ार से ज़्यादा की रक़म है मेरी। सब लिखी है मेरे पास... क्या बात करते हो दरोगा...! सुना...? ये नहीं है हमारा।”

    बशीर दरोग़े ने रसान से हाथ उठा कर सबको जैसे तसल्ली दी। मगर वो बोला तो उसके लहजे में क़यामत ख़ेज़ सर्दी थी। अराम से अराम से, अराम से बेटा! तईं कहती है तेरा नईं है, तो जिसका भी है ले लो बई। औरतों शोर नईं कर। खप नईं पा। दूसरों को भी समजने दे। अपनी बात ज़रूर समज्ह... मगर अराम से।”

    रोज़ी के बराबर रानी खड़ी हुई। दरोग़े के चेहरे के आगे हाथ नचा के उसने चीख़ती आवाज़ में कहा, “ओ अराम गया तेल लेने, ये हुवा क्या है? हमारा सामान किधर है ओए...? पैसे कहाँ हैं?”

    “पैसे...? समान? दरोगा चीख़ा।” ओए पैसे का... समान का मेरे से क्यूँ पूछती है?”

    ख़बर नहीं पाँच कि छःज़नानी आवाज़ों ने क़यामत के तीहे में सवाल किया, तुझ से नहीं तो किस से पूछें?”

    भैंसे ने बारह धौंकनियों की फुनकार में कहा, “दद्दी से पूछ, दद्दी से!”

    सब सन्नाटे में रह गए। मम्मंद रियाज़ ने सोचा, “अफ़सोस! भैय्यन के पीठ पेशे एहो जी बकवास?”

    चीख़ती हुई ग़ो ग़ाइयाँ ऐसे चुप हो गई थीं जैसे उन्होंने शाख़ पर सरकता हुआ साँप देख लिया हो।

    मम्मंद रियाज़ ने छोटी सी नक़ली डकार ली। आलले...! लओजी, तिजोरी ख़ाली पई है... तय दद्दी वे ईदर कोई नईं। लल्ले...! पर दद्दी ने वी, अल्लाह यानता है, एहोई ठे टर करना सी!” फिर उसने कुछ कड़वे पन, कुछ हमदर्दी में सोचा, सारी यिंदगी इनाँ गश्तियों, नसीबाँ वालियों ने अपनी वो करा करा के पेहा कठ्ठा कीता सी। तय हुन, लओजी, तिजोरी ख़ाली पई है। भागाँ वाली, बिल्कुल ख़ाली... अल ले... उल ले!”

    पै दर पै जाली डकारें सुन के, उस हाहाकार में भी, सब उसे घूर के देखने लगे।

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