नशेब-ए-हस्ती से अफ़्सोस हम उभर न सके
फ़राज़-ए-दार से पैग़ाम आए हैं क्या क्या
मेरे ही ख़ून में नहला के 'शरर'
वो सलीबों पे सजा देगा मुझे
हर रोज़ इक आवाज़ा अनल-हक़ का लगाएँ
देखें तो कि है सिलसिला-ए-दार कहाँ तक
अब तो ज़रूरत की इक पगड़ी है यारों के कंधों पर
हम लोगों के साथ यहाँ से रस्म-ए-सलीब-ओ-दार उठी
न जब अहल-ए-ख़िरद ने बात मानी
तो फिर शर्त-ए-सलीब-ओ-दार ठहरी
सूलियाँ नस्ब रहीं क़हत-ए-जुनूँ है भी तो क्या
कुछ न कुछ अब भी निकल आएँगे गर्दन वाले