नशेब-ए-हस्ती से अफ़्सोस हम उभर न सके
फ़राज़-ए-दार से पैग़ाम आए हैं क्या क्या
मेरे ही ख़ून में नहला के 'शरर'
वो सलीबों पे सजा देगा मुझे
हर रोज़ इक आवाज़ा अनल-हक़ का लगाएँ
देखें तो कि है सिलसिला-ए-दार कहाँ तक
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
नशेब-ए-हस्ती से अफ़्सोस हम उभर न सके
फ़राज़-ए-दार से पैग़ाम आए हैं क्या क्या
मेरे ही ख़ून में नहला के 'शरर'
वो सलीबों पे सजा देगा मुझे
हर रोज़ इक आवाज़ा अनल-हक़ का लगाएँ
देखें तो कि है सिलसिला-ए-दार कहाँ तक