आधा दाना आधा पागल नईं नईं नईं
उस को पाना है तो पूरा पागल बन
इक धमा-चौकड़ी है सीने में
ये कहीं बे-लगाम दिल तो नहीं
लगता है शहरों में जुनूँ के मौसम अब नहीं आते
हम तो सहरा में बैठे हैं धूप का फ़र्श बिछाए
सूलियाँ नस्ब रहीं क़हत-ए-जुनूँ है भी तो क्या
कुछ न कुछ अब भी निकल आएँगे गर्दन वाले
अहल-ए-जुनूँ की आहट सुन कर दश्त-ए-वफ़ा बेचैन हुआ
हर हर गोशे से पिछली ज़ंजीरों की झंकार उठी
गया न कोई मिरे बा'द कू-ए-क़ातिल तक
तरस गया कफ़-ए-क़ातिल रग-ए-गुलू के लिए