तल्ख़ियाँ ख़ून-ए-जिगर की शा'इरी में घोल कर
चंद मिसरे' लाएँ हैं हम भी सुनाने के लिए
ढूँड अफ़्लाक नए और ज़मीनें भी नई
हो ग़ज़ल का तिरी हर शे'र नया हर्फ़-ब-हर्फ़
मुझ को तन्हा छोड़ने वाले तू न कहीं तन्हा रह जाए
जिस पर तुझ को नाज़ है उतना उस का नाम ज़माना है