तुझे हम वली समझते जो न बादा ख़्वार होता

आल-ए-अहमद सूरूर

तुझे हम वली समझते जो न बादा ख़्वार होता

आल-ए-अहमद सूरूर

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    रावी: यादगार-ए-ग़ालिब में हाली लिखते हैं,‎

    “मरने से कई बरस पहले चलना फिरना मौक़ूफ़ हो गया था। अक्सर औक़ात पलंग पर ‎पड़े रहते थे। ग़िज़ा कुछ ना रही थी। 1866 ई. में ख़्वाजा अज़ीज़ लखनवी लखनऊ से ‎कश्मीर जाते वक़्त रास्ते में ग़ालिब से मिले थे, मिर्ज़ा साहिब के पुख़्ता मकान में एक ‎बड़ा फाटक था, जिसकी बग़ल में एक कमरा और कमरे में एक चारपाई बिछी हुई थी। ‎उस पर एक नहीफ़-उल-जुस्सा आदमी, गंदुमी रंग, अस्सी-बयासी साल के ज़ईफ़, लेटे ‎हुए, एक मुजल्लद किताब सीने पर रखे, आँखें गड़ोए हुए पढ़ रहे थे। ये ग़ालिब थे, जो ‎दीवान-ए-क़ाआनी मुलाहिज़ा फ़र्मा रहे थे। 
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    ख़्वाजा अज़ीज़: आदाब बजा लाता हूँ (ज़ोर से) आदाब बजा लाता हूँ (वक़फ़ा) 

    ग़ालिब: तशरीफ़ रखिए। बंदा-परवर, ये क़लमदान और काग़ज़ है, आँखों से किसी क़दर ‎सूझता भी है लेकिन कानों से बिल्कुल सुनाई नहीं देता। जो कुछ मैं पूछूँ उसका जवाब ‎लिख दो। कहां से आए हो, क्या नाम है। (वक़फ़ा) 

    अज़ीज़ लखनवी, मुझसे मिलने आए हो तो ज़रूर कुछ न कुछ कहते होगे। कुछ अपना ‎कलाम भी सुनाओ। 

    अज़ीज़: हम तो आपका कलाम आपकी ज़बान मुबारक से सुनने की ग़रज़ से आए थे। 

    ग़ालिब: भई कुछ तो सुनाओ। 

    अज़ीज़: एक मतला याद आया है, वो अर्ज़ किए देता हूँ। महज़ तामील-ए-इरशाद है 

    मह-ए-मिस्र अस्त दाग़ अज़ रश्क-ए-महताबे कि मन दारम 
    ज़ुलेख़ा को रशद अज़ हसरत-ए-ख़्वाबे कि मन दारम 

    ग़ालिब: सुब्हान-अल्लाह क्या मज़े का मतला कहा है। भाई तुम तो ख़ूब कहते हो (शे’र ‎दोहराते हैं) ।  

    अज़ीज़: अब आप भी कुछ इरशाद फ़रमाईए। मुद्दत से आरज़ू थी कि आपका कलाम ‎आपकी ज़बान से सुनें। 

    ग़ालिब: क्या सुनाऊँ, मेरा हाल देख ही रहे हो। एक ग़ज़ल के चंद शे’र याद आगए। वही ‎सुनाए देता हूँ, 

    हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़ाहिश पे दम निकले 
    बहुत निकले मरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले 
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    डरे क्यों मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर 
    वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले 
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    निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन 
    बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले 
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    भरम खुल जाये ज़ालिम तेरी क़ामत की दराज़ी का 
    अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले 
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    हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बादा आशामी 
    फिर आया वो ज़माना जो जहां में जाम-ए-जम निकले 
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    हुई जिनसे तवक़्क़ो ख़स्तगी की दाद पाने की 
    वो हमसे भी ज़्यादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले 
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    मुहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का 
    उसी को देखकर जीते हैं जिस काफ़िर प दम निकले 
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    कहां मयख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहां वाइज़ 
    पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले 
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    अज़ीज़: हुज़ूर आपने बड़ा सरफ़राज़ किया। गुस्ताख़ी होती है मगर अभी सेरी नहीं हुई। 

    ग़ालिब: भाई, अब मैं थक गया। एक शे’र और सुन लो। आजकल अक्सर पढ़ता रहता ‎हूँ, 

    ज़िंदगी अपनी जो इस शक्ल से गुज़री ‘ग़ालिब’ 
    हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे 
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    ग़ालिब: (बआवाज़-ए-बुलंद) खाना लाओ। 

    अज़ीज़: हुज़ूर तकलीफ़ न कीजिए। हम सिर्फ़ थोड़ी देर के लिए उतर पड़े थे। रेल का ‎वक़्त बिल्कुल क़रीब है। बग्घी सराय में खड़ी है, अस्बाब बंधा हुआ रखा है। आपसे ‎मिलने को आए थे, अब इजाज़त चाहते हैं। 

    ग़ालिब: आपकी ग़ायत इस तकलीफ़ से ये थी कि मेरी सूरत और कैफ़ियत मुलाहिज़ा ‎फ़रमाएं, ज़ोफ़ की हालत देखी कि उठना बैठना दुशवार है। बसारत की हालत देखी कि ‎आदमी को पहचानता तक नहीं हूँ। समाअत की कैफ़ियत मुलाहिज़ा की कि कोई कितना ‎ही चीख़े, ख़बर नहीं होती। ग़ज़ल पढ़ने का अंदाज़ मुलाहिज़ा किया, कलाम सुना, अब ‎एक बात रह गई है कि मैं क्या खाता हूँ, इसको भी मुलाहिज़ा करते जाइए। सुबह को ‎सात बादाम का शीरा, क़ंद के शर्बत के साथ। दोपहर को टके भर गोश्त का गाढ़ा पानी, ‎कभी दो-चार फुल्के। क़रीब शाम तीन तले हुए कबाब, कुछ घड़ी रात गए पाँच रुपये भर ‎शराब, ज़िंदगी अज़ाब हो गई है। हाय, मेरा एक शे’र है, 

    याद थीं हमको भी रंगारंग बज़्म-आराइयाँ 
    लेकिन अब नक़्श-ओ-निगार ताक़-ए-निस्याँ हो गईं 
    ‎(फिर ठहर ठहर कर गुनगुनाते हैं) 
    ‎ 
    रावी: ग़ालिब आगरे में रौनक़ अफ़रोज़ हैं। दीवान सिंह राजा के यहां ग़ालिब के एज़ाज़ ‎में एक मख़सूस ग़ैर तरही मुशायरा है। इफ़हाम उद्दीन साहिर, अहमद शेवन, ज़ैन-उल-‎आबदीन शोरिश, ग़ुलाम ग़ौस बेख़बर शरीक हैं। ग़ालिब बातें कर रहे हैं। 

    ग़ालिब: भई हमको इब्तदाए शबाब में एक मुर्शिद-ए-कामिल ने नसीहत की थी कि ‎ज़ोह्द-ओ-वरा मंज़ूर नहीं। ताहम क़ानेअ फ़िस्क़-ओ-फ़ुजूर हैं। पियो, खाओ, मज़े उड़ाओ। ‎मगर ये याद रहे कि मिस्री की मक्खी बनो, शहद की मक्खी न बनो। सो मेरा इस ‎नसीहत पर अमल रहा है। मैं जब बहिश्त का तसव्वुर करता हूँ और सोचता हूँ कि ‎अगर मग़फ़िरत हो गई और एक क़स्र मिला और एक हूर मिली। इक़ामत-ए-जाविदानी ‎है और उसी एक नेक बख़्त के साथ ज़िंदगानी है। इस तसव्वुर से जी घबराता है और ‎कलेजा मुँह को आता है। है है वो हूर अजीरन हो जाएगी। तबीयत क्यों न घबराएगी। ‎वही ज़मुर्रदें काख़ और वही तूबा की एक शाख़, चश्म-ए-बद्दूर, वही एक हूर।
    ‎ 
    बेख़बर: हुज़ूर ज़रा इस हूर को भी देखिए। 

    ग़ालिब: कौन? 

    बेख़बर: ये दुर्गा बाई सनम हैं। वाह, क्या सज-धज है। क़श्क़े की आब-ओ-ताब और ‎सब्ज़ दोशाले की आन बान तो देखिए। 

    सनम: आदाब बजा लाती हूँ। आपका अरसे से शुहरा सुना था, आज ज़ियारत हुई। 

    ग़ालिब: वाह, सियह चोटी, ज़रअफ़शाँ मांग, सब्बज़ उस पर दोशाला है 

    तमाशा है पर ताऊस में काले को पाला है 

    सनम: आपकी ज़र्रा नवाज़ी है। 

    ग़ालिब: आप ज़र्रा नहीं आफ़ताब हैं। हाँ साहिब, अब मुशायरा शुरू हो, सनम साहिबा ‎आप ही शुरू कीजिए। 

    सनम: अर्ज़ करती हूँ, 

    कुछ दवा-ए-दिल-ओ-जिगर न हुई 
    मर गए तुम उन्हें ख़बर न हुई 
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    दिल-ओ-जां हिज्र में गए ऐसे 
    एक को एक की ख़बर न हुई 
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    रहें अब दैर ही में चल के ‘सनम’ 
    अपनी काबे में तो बसर न हुई 
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    ग़ालिब: सुब्हान-अल्लाह, शायरा और शे’र दोनों का जवाब नहीं। ख़ैर, अब चंद शे’र मेरे ‎भी सुन लीजिए,

    है बस-कि हर इक उनके इशारे में निशाँ और 
    करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमाँ और 
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    या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मरी बात 
    दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़बां और 
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    है ख़ून-ए-जिगर जोश में दिल खोल के रोता 
    होते जो कई दीदा-ए-खू ना ब फ़िशां और 
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    मरता हूँ हर इक वार पे हरचंद सर उड़ जाये 
    जल्लाद को लेकिन वो कहे जाएं कि हाँ और 
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    हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे 
    कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और 
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    बेख़बर: सच है, ग़ालिब का है अंदाज़ बयाँ और। 
    ‎(हल्की मौसीक़ी) 
    ‎ 
    रावी: मुफ़्ती सदर उद्दीन ख़ां आज़ुर्दा की अदालत है। ग़ालिब का मुक़द्दमा पेश होता ‎है। इल्ज़ाम ये है कि उन्होंने शराब क़र्ज़ ली और दाम न दे सके। 
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    मुफ़्ती सदर उद्दीन आज़ुर्दा: कहिए मिर्ज़ा साहिब, आपको अपनी सफ़ाई में कुछ कहना ‎है। इस्तिग़ासा के गवाहों के बयानात बिल्कुल वाज़ेह हैं। 

    ग़ालिब: पीर-ओ-मुर्शिद मुझे कुछ अर्ज़ करना नहीं, मेरा एक शे’र है। इस वक़्त याद ‎आया, वो सुनाए देता हूँ,

    क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ 
    रंग लाएगी हमारी फ़ाका मस्ती एक दिन 

    मुफ़्ती साहिब: मिर्ज़ा साहिब क्या शे’र कहा है। आप जैसे शायर बेबदल के लिए अदालत ‎में इस तरह खिचा खिचा फिरना आपकी तौहीन है, आप तशरीफ़ ले जाइए। जुर्माने की ‎रक़म मैं अपने पास से अदा किए देता हूँ।
    ‎ 
    दरबारी के हल्के हल्के सुर आहिस्ता-आहिस्ता बुलंद होजाते हैं। 

    नक़ीब: निगाह-ए-रूबरू, आला हज़रत ख़िताब फ़रमाते हैं। 

    बहादुर शाह ज़फ़र: अब मिर्ज़ा नौशा की बारी है। मिर्ज़ा साहिब, अपनी ग़ज़ल सुनाइए। ‎मगर रेख़्ता हो, फ़ारसी नहीं। 

    ग़ालिब: पीर-ओ-मुर्शिद,

    फ़ारसी बीं ता-बीनी नक़्श हाय रंग रंग 
    बगुज़र अज़ मजमूआ-ए-उर्दू कि बेरंग मन अस्त
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    ज़फ़र: माबदौलत तो उर्दू में शे’र कहते हैं और उसी का शे’र पसंद करते हैं। 

    ग़ालिब: अर्ज़ करता हूँ,

    ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता 
    अगर और जीते रहते, यही इंतज़ार होता 
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    तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान छूट जाना 
    कि ख़ुशी से मर न जाते अगर एतबार होता 
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    कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर नीम कश को 
    ये ख़लिश कहां से होती जो जिगर के पार होता 
    ‎ 
    ग़म अगरचे जांगुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है 
    ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता 
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    उसे कौन देख सकता कि यगाना है वो यकता 
    जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो-चार होता 
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    ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान ‘ग़ालिब’ 
    तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता 
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    सुब्हान-अल्लाह, सुब्हान-अल्लाह।
    ‎ 
    ज़फ़र: भई, हम तो तब भी वली न समझते। 

    ग़ालिब: पीर-ओ-मुर्शिद तो अब भी ऐसा ही समझते हैं मगर ये इसलिए इरशाद हुआ कि ‎मैं अपनी विलाएत पर कहीं मग़रूर न होजाऊं। 

    ज़फ़र: (हल्का क़हक़हा) मिर्ज़ा नौशा, ख़ुदा तुम्हें ज़िंदा रखे। बड़े ही दिलचस्प आदमी हो ‎और भई पढ़ते तो ख़ूब हो। 
    ‎ 
    रावी: 9 बजे सुबह का अमल है, ग़ालिब खाना खाने अंदर जाते हैं। चेहरे पर परेशानी के ‎आसार हैं। एक तोता सर्दी की वजह से सिमटा सिमटाया परों में चोंच दबाए बैठा है। 

    ग़ालिब: मियां मिट्ठू, न तुम्हारे जोरू न बच्चे, तुम किस फ़िक्र में सर झुकाए बैठे हो। 

    उमराव बेगम: मैं कहती हूँ ये तुम्हें हो क्या गया है और कुछ न मिला तो इस तोते के ‎पीछे पड़ गए। 

    ग़ालिब: तो क्या झूट कहता हूँ, मेरा एक फ़ारसी का क़तआ है,

    ब आदम ज़न ब शैतान तौक़ लानत 
    सिपर दंदाज़ रह-ए-तकरीम-ओ-तज़लील 
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    व लेकिन दर असीरी तौक़-ए-आदम 
    गिराँ-तर आमद अज़ तौक़-ए-अज़ाज़ील 
    ‎ 
    उमराव: हाँ हाँ, तुम तो मुझे तौक़-ए-लानत समझते हो। मैं तो रोज़ ख़ुदा से दुआ माँगती ‎हूँ कि मुझ गुनाहगार को इस दुनिया से उठा ले या तुम्हारी इस्लाह कर दे। बूढ़े होने को ‎आए, क़ब्र में पैर लटकाए बैठे हो, मगर ये मुई शराब ऐसी मुँह से लगी है कि छूटती ही ‎नहीं। 

    ग़ालिब: तुम्हें क्या, तुमने तो अपने खाने पीने के बर्तन अलग कर ही लिये। 

    उमराव: (तेज़ हो कर) क्यों न करती। हाँ, ख़ूब याद आया। तुमने मुझे उस मकान की ‎महल सरा देखने को भेजा था। अभी देखकर आई हूँ। तुम कहते थे दीवानख़ाना बहुत ‎अच्छा है। महल सरा भी बुरी नहीं, मेरा क्या है, मैं तो किराए के मकान में रहने की ‎आदी हो चुकी हूँ, मगर मैंने सुना है उस मकान में कोई बला है।
    ‎ 
    ग़ालिब: क्या दुनिया में आपसे बढ़कर भी कोई बला है। 

    उमराव: यही तो तुम्हारी बातें मुझे पसंद नहीं, फिर छेड़खानी पर उतर आए। 

    ग़ालिब: मैं हूँ हंसोड़ और तू है मुक़त्ता, मेरा तेरा मेल नहीं। 

    उमराव: सुना है शहर में वबा फैल गई है, हैजे़ से बराबर मौतें हो रही हैं। तुम तो बाहर ‎दोस्त अहबाब में दिल बहलाते रहते हो। मैं घर में पड़ी दहला करती हूँ। 

    ग़ालिब: कैसी वबा, जब एक सत्तर बरस के बुड्ढे और सत्तर बरस की बुढ़िया को न मार ‎सके तो तुफ़ है, उस वबा पर। अच्छा, अब मैं बाहर जाता हूँ, तुम्हारे वज़ीफ़े को देर ‎होती होगी। (मूसीक़ी)‎
    ‎‎ 
    रावी: शेफ़्ता के मकान पर मेहमान जमा हैं। मुफ़्ती सदर उद्दीन आज़ुर्दा, मौलवी फ़ज़ल ‎हक़, मुस्तफ़ा ख़ां शेफ़्ता, उर्दू दीवान-ए-ग़ालिब का तज़्किरा कर रहे हैं। 

    आज़ुर्दा: मिर्ज़ा साहिब, बेदिल का रंग आपने ख़ुद ही तर्क कर दिया है। इंतिख़ाब में ऐसे ‎अशआर सब निकाल दीजिए। 

    ग़ालिब: क्यों भई मुस्तफ़ा ख़ां, तुम्हारी क्या राय है। भई, तुम तो जानते हो तुम्हारी ‎राय पर मुझे कितना एतिमाद है। 

    शेफ़्ता: पीर-ओ-मुर्शिद, ये आपकी मुहब्बत है कि मेरी नाचीज़ राय को इस क़दर वक़अत ‎देते हैं। आप ख़ुद ही फ़ैसला कीजिए कि आपके रंग में पहले से तबदीली हुई है कि ‎नहीं।
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    ग़ालिब: क्यों नहीं, मेरी तबीयत अगरचे इब्तिदा से नादिर ख़्यालात की जोया थी लेकिन ‎आज़ादा रवी के सबब से ज़्यादातर उन लोगों की तक़लीद करता रहा जो सीधे रास्ते से ‎हट गए थे। आख़िर जब उन लोगों ने जो इस राह में पेशरौ थे देखा कि मैं बावजूद इस ‎के कि उनके हमराह चलने की क़ाबिलियत रखता हूँ और फिर भी बेराह सा भटकता ‎फिरता हूँ, तो उनको मेरे हाल पर रहम आया और उन्होंने मुझ पर मुरब्बियाना नज़र ‎डाली। शेख़ अली हज़ीं ने मुस्कुराकर मेरी बेराह रवी मुझको जताई। तालिब आमली और ‎उर्फ़ी शीराज़ी की ग़ज़बआलूद निगाह ने आवारा फिरने का जो माद्दा मुझमें था, उसको ‎फ़ना कर दिया। ज़ुहूरी ने मेरे बाज़ू पर तावीज़ और कमर पर ज़ाद-ए-राह बाँधा और ‎नज़ीरी ने अपनी रविश-ए-ख़ास पर चलना मुझे सिखाया। अब मैंने वो रंग इख़्तियार ‎किया है कि फ़ारसी को भी रेख़्ते पर रश्क आए। 
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    आज़ुर्दा: मगर मिर्ज़ा साहिब, ये सच्ची बात तो है कि आप बहुत अर्से तक भटकते रहे ‎हैं और अब भी सीधी राह पर नहीं आए हैं। 

    शेफ़्ता: मिर्ज़ा साहिब का ये शे’र आपने सुना है, 

    लाखों लगाव एक चुराना निगाह का 
    लाखों बनाव एक बिगड़ना इताब में 
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    आज़ुर्दा: वाह क्या शे’र है। ये शायरी नहीं एजाज़ है, मगर मिर्ज़ा साहिब, ये तो आपका ‎रंग नहीं, ख़ास हमारी तर्ज़ का शे’र है। 

    ग़ालिब: तो ऐ कि मह्व-ए-सुख़न गुस्तरान पेशीनी 

    मुबाश मुनकिर-ए-ग़ालिब कि दर ज़माना-ए-तस्त 
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    फ़ज़ल हक़: मिर्ज़ा साहिब, आज़ुर्दा की राय सही है। आपको याद नहीं जब आप ‎अकबराबाद से आए थे तो यहां के मुशायरों में आपकी मुश्किल-पसंदी पर किस क़दर ‎तंज़-ओ-तअरीज़ होती थी। मुल्ला अब्दुलक़ादिर रामपुरी ने तो एक बेमानी शे’र आपसे ‎मंसूब ही कर दिया था। अगर आप चाहें तो नमूने के तौर पर चंद शे’र बेदिल के रंग के ‎रहने दें। वर्ना उर्दू दीवान में तो आपको मौजूदा रंग में ज़्यादा जलवागर होना चाहिए।
    ‎ 
    ग़ालिब: अच्छा भाई तुम और शेफ़्ता मिलकर मेरे रेख़्ते का इंतिख़ाब कर दो। फिर मैं ‎उसे एक नज़र देख लूँगा और उसके बाद दीवान छापेखाने को दे दिया जाएगा। तुम दोनों ‎की नुक्ता संजी और ज़ौक़-ए-सुख़न का मैं क़ाइल हूँ। 

    फ़ज़ल हक़: अभी नवाब साहिब ने आपका जो शे’र सुनाया था, उस ग़ज़ल के और शे’र ‎याद हों तो सुनाइए। इस ज़मीन में मोमिन और ज़ौक़ की भी मशहूर ग़ज़लें हैं। 

    ग़ालिब: मेरा भी दोग़ज़ला है। मगर भाई, अब हाफ़िज़ा कमज़ोर हो गया है, चंद ही शे’र ‎याद हैं, वो सुन लो,

    मिलती है खू-ए-यार से नार इलतिहाब में 
    काफ़िर हूँ गर न मिलती हो राहत अज़ाब में 
    ‎ 
    क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूं 
    मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में 
    ‎ 
    मुझ तक कब उनकी बज़्म में आता था दौर-ए-जाम 
    साक़ी ने कुछ मिला न दिया हो शराब में 
    ‎ 
    लाखों लगाव एक चुराना निगाह का 
    लाखों बनाव एक बिगड़ना इताब में 
    ‎ 
    वो नाला-ए-दिल में ख़स के बराबर जगह न पाए 
    जिस नाले से शिगाफ़ पड़े आफ़ताब में 
    ‎ 
    असल-ए-शुहूद-ओ-शाहिद-ओ-मशहूद एक हैं 
    हैरां हूँ फिर मुशाहिदा है किस हिसाब में
    हैं गैब गैब जिसको समझते है हम शुहूद
    हैं ख़्वाब में हनूज़ जो जागे हैं ख़्वाब में 
    ‎ 
    फ़ज़ल: क्या कहने हैं मिर्ज़ा साहिब, दरिया को कूज़े में बंद करना यही है।
    ‎ 
    रावी: ग़ुरूब-ए-आफ़ताब के वक़्त ग़ालिब खाना खा रहे हैं। हाली के साथ दूसरे शागिर्द भी ‎मौजूद हैं, हाली रूमाल से मक्खियां झल रहे हैं। 

    ग़ालिब: आप नाहक़ तकलीफ़ फ़रमाते हैं। मैं इन कबाबों में से आपको कुछ भी न दूँगा। ‎‎(हंसकर) भई आपने नवाब अब्दुल्लाह ख़ां का क़िस्सा सुना है। उनके दस्तरख़्वान पर ‎सब के लिए हर क़िस्म के खाने होते थे। मगर ख़ास उनके लिए हमेशा एक ही चीज़ ‎तैयार होती थी। एक दिन मुज़ाअफ़र उनके सामने आया। मुसाहिबों में से एक डोम बहुत ‎मुँह लगा हुआ था। नवाब साहिब ने उसको खाना देने के लिए ख़ाली रकाबी मांगी। ‎जिसके आने में कुछ देर हुई। नवाब खाते-जाते थे और ख़ाली रकाबी बार-बार मांगते थे। ‎मुसाहिब नवाब के आगे रूमाल हिलाने लगा और कहा, “हुज़ूर और रकाबी किया ‎कीजिएगा। अब यही ख़ाली हुई जाती है। नवाब ये फ़िक़रा सुनकर फड़क गए और वही ‎रकाबी उसकी तरफ़ सरका दी। (थके हुए लहजे में) लो भई, अब मैं ज़रा आराम करना ‎चाहता हूँ, पैर की टीस होश उड़ाए देती है (कराह कर) तुम लोग मेरे क़रीब आ जाओ ‎बातें करने से तबीयत बहली रहेगी। 
    ‎ 
    मजरूह: लाइए में आपके पांव दबा दूं।  

    ग़ालिब: भई तू सय्यद ज़ादा है, मुझे क्यों गुनहगार करता है। 

    मजरूह: ऐसा ही है तो मुझे कुछ उजरत दे दीजिएगा। 

    ग़ालिब: अच्छा यही सही। 

    हाली: वाह क्या ख़ुशगवार हवा है। आसमान को देखिए क्या निखरा हुआ है। 

    ग़ालिब: जो काम ख़ुदराई से किया जाता है, अक्सर बेढंगा होताहै। सितारों को देखिए ‎किस अबतरी से बिखरे हुए हैं न तनासुब है न इंतज़ाम, न बेल है न बूटा। मगर ‎बादशाह ख़ुद-मुख़्तार है कोई दम नहीं मार सकता। (हल्का क़हक़हा) 
    ‎ 
    हाली: आपका एक शे’र मेरी समझ में नहीं आया। 

    ग़ालिब: तो क्या ताज्जुब है। मेरी ज़िंदगी भी तो तुम्हारी समझ में नहीं आई। अच्छा वो ‎क्या शे’र है? 

    हाली: क़मरी कफ़-ए-ख़ाकसतर-ओ-बुलबुल क़फ़स-ए-रंग 

    ऐ नाला-ए-निशान-ए-जिगर सोख़्ता क्या है 
    ‎ 
    ग़ालिब: अरे भाई, ऐ की जगह जुज़ पढ़ो मअनी ख़ुद समझ में आजाऐंगे। 

    हाली: अगर आप ऐ की जगह जुज़ का लफ़्ज़ रख देते या दूसरा मिसरा इस तरह कहते ‎कि “ऐ नाला-ए-निशाँ तेरे सिवा इश्क़ का क्या है” तो क्या हर्ज था। 

    ग़ालिब: तुम ठीक कहते हो। मतलब तो वाज़ेह होजाता मगर मेरी इन्फ़िरादियत का ख़ून ‎हो जाता। मैं शारेअ आम पर चलने से बचता हूँ। मैंने एक दफ़ा अपने मरने की तारीख़ ‎कही थी। ग़ालिब मर्द। उसी साल शहर में वबा फैली। साल गुज़रने पर किसी ने कहा ‎कि हज़रत आपने तो अपने मरने की तारीख़ भी कह ली थी। फिर ये क्या हुआ। मैंने ‎उसे लिखा कि लिसान-उल-गैब की बात ग़लत नहीं हो सकती, मगर वबाए आम में ‎मरना मेरी शान के ख़िलाफ़ था। मैं तर्ज़-ए-ख़्याल में जिद्दत और तुर्फ़गी देखता हूँ। ‎शायरी को मअनी आफ़रीनी समझता हूँ, क़ाफ़िया-पैमाई नहीं। मैं ऐसी रिआयतों को जो ‎हर शख़्स को सूझ जाएं मुब्तज़िल जानता हूँ। एक शख़्स ने एक दफ़ा एक शे’र की मेरे ‎सामने बहुत तारीफ़ की। मैंने पूछा कि इरशाद तो हो वो कौन सा शे’र है, उसने मीर ‎अमानी असद का ये शे’र सुनाया, 

    असद इस जफ़ा पर बुतों से वफ़ा की 
    मरे शेर शाबाश रहमत ख़ुदा की 
    ‎ 
    मुझे उस पर बहुत ग़ुस्सा आया। बेसाख़्ता ज़बान से निकला कि हज़रत, अगर ये किसी ‎और असद का शे’र है तो उस पर रहमत ख़ुदा की और अगर मुझ असद का शे’र है तो ‎मुझ पर लानत ख़ुदा की। मेरे शेर और रहमत ख़ुदा की। ऐसे मुहावरे जो आमियों और ‎सौकियों की ज़बान पर जारी हैं मेरे शे’र की शरीयत में हराम हैं। मैं तो जहां सल्ले-‎अला भी अपने किसी शागिर्द के यहां लिखा देखता हूँ उसे नाम-ए-ख़ुदा कर देता हूँ। ‎मदह-ओ-सताइश की मुझे पर्वा नहीं तहसीन नाशनास का मैं क़ाइल नहीं,

    न सताइश की तमन्ना न सिले की पर्वा 
    गर नहीं हैं मेरे अशआर मअनी न सही 

    अच्छा भई मीर मेह्दी अब तुम बस करो, थक गए होगे। 
    ‎ 
    मजरूह: हुज़ूर मेरे पैर दाबने की उजरत। 

    ग़ालिब: भैया कैसी उजरत, तुमने मेरे पांव दाबे, मैंने तुम्हारे पैसे दाबे। हिसाब बराबर ‎हुआ। (क़हक़हा)‎
    ‎‎ 
    रावी: 1860 ई.ग़दर का हंगामा फ़िरो हो चुका है, मगर दिल्ली पर हर-सू वीरानी छाई हुई ‎है। लोग परेशान हैं, जान-ओ-माल, आबरू कुछ महफ़ूज़ नहीं। ग़ालिब ने मीर मेह्दी ‎मजरूह को ख़त लिखा है। मजरूह अपने अहबाब को पढ़ कर सुना रहे हैं। 
    ‎ 
    मजरूह: भाई क्या पूछते हो, क्या लिखूँ। दिल्ली की हस्ती मुनहसिर कई हंगामों पर है। ‎क़िला, चाँदनी चौक, हर-रोज़ मजमा जामा मस्जिद का, हर हफ़्ते सैर जमुना के पुल ‎की, हर साल मेला फूल वालों का, ये पांचों बातें अब नहीं। फिर कहो दिल्ली कहां। ‎परसों मैं सवार हो कर कुओं का हाल दरयाफ़्त करने गया। मस्जिद जामे से राजघाट ‎दरवाज़ा तक बिला मुबालग़ा एक सहरा लक़-ओ-दक़ है। ईंटों के ढेर जो पड़े हैं वो अगर ‎उठ जाएं तो एक हू का आलम हो जाए। क़िस्सा मुख़्तसर शहर सहरा हो गया। अब जो ‎कुँवें जाते रहे और पानी गौहर-ए-नायाब हो गया तो ये सहरा सहराए कर्बला हो जाएगा। ‎अल्लाह अल्लाह, दिल्ली वाले अब तक यहां की ज़बान को अच्छा कहते हैं, वाह-रे ‎हुस्न-ए-एतिक़ाद, बंदा-ए-ख़ुदा। उर्दू बाज़ार न रहा, उर्दू कहां, दिल्ली कहां। वल्लाह अब ‎शहर नहीं है, कैंप है, छावनी है। न क़िला न शहर, न बाज़ार, न नहर। 
    ‎ 
    मजरूह: हाय क्या था क्या हो गया। 

    हाली: तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़, न सुना जाएगा हमसे ये फ़साना ‎हरगिज़। ग़ालिब का आख़िरी ज़माना है, ज़ोफ़ बहुत बढ़ गया है। अक्सर पलंग पर लेटे ‎लेटे गुज़रती है। इस वक़्त मुंशी हरगोपाल तफ्ता आए हुए हैं। उनसे बातें हो रही हैं।
    ‎ 
    ग़ालिब: मैं तो बनी आदम को मुसलमान हो या हिंदू, या नसरानी, अज़ीज़ रखता हूँ और ‎अपना भाई गिनता हूँ। दूसरा माने या न माने। बाक़ी रही वो अज़ीज़दारी जिसको अह्ल-‎ए-दुनिया क़राबतदारी कहते हैं। उसको क़ौम और ज़ात और मज़हब और तरीक़त शर्त है ‎और उसके मुरातिब-ओ-मदारिज हैं। दुनियादार नहीं हूँ, फ़क़ीर ख़ाकसार हूँ। क़लंदरी व ‎आज़ादगी व ईसार-ओ-करम के जो दवाई मेरे ख़ालिक़ ने मुझमें भर दिए हैं बक़दर-ए-‎हज़ार एक भी ज़ुहूर में न आए। न वो ताक़त-ए-जिस्मानी कि लाठी हाथ में लूं और उस ‎में शतरंजी और टीन का लोटा, सूत की रस्सी लटका लूं और पा पियादा चल दूं। कभी ‎शीराज़ जा निकला, कभी मिस्र में जा ठेरा, कभी नजफ़ जा पहुंचा। न वो दस्तगाह कि ‎एक आलम का मेज़बान बन जाऊं। अगर तमाम आलम में न हो सके न सही जिस ‎शहर में रहूं उस शहर में तो नंगा भूका नज़र न आए। 
    ‎ 
    तफ्ता: हुज़ूर वो मेरी ग़ज़ल पर अब तक इस्लाह न हुई। मैं चाहता था कि तीसरा ‎दीवान जल्द मुरत्तब कर लेता। 

    ग़ालिब: मिर्ज़ा तफ्ता, तुम मश्क़-ए-सुख़न कर रहे हो और मैं मश्क़-ए-फ़ना में ‎मुसतग़रिक़ हूँ। बूअली सेना के इल्म और नज़ीरी के शे’र को ज़ाए और बेफ़ायदा और ‎मौहूम समझता हूँ। ज़ीस्त बसर करने को थोड़ी सी राहत दरकार है। बाक़ी हिक्मत और ‎सलतनत और शायरी और साहिरी सब बेकार है। हिंदुओं में अगर कोई अवतार हुआ तो ‎क्या और मुसलमानों में नबी बना तो क्या। दुनिया में नाम आवर हुए तो क्या और ‎गुमनाम रहे तो क्या। कुछ मआश हो कुछ सेहत जिस्मानी, बाक़ी सब वहम है ए यार ‎जानी। अच्छा भाई अब मैं थक गया। 
    ‎ 
    रावी: ग़ालिब बिस्तर-ए-मर्ग पर हैं। बड़ी देर के बाद होश आया है, हाली और दूसरे ‎अहबाब पास बैठे हैं। ग़ालिब एलाई के ख़त का जवाब लिखवा रहे हैं। 

    (नहीफ़ आवाज़ में और ठेर ठेर कर) जान-ए-ग़ालिब, तुम मेरा हाल क्या पूछते हो। दो-‎चार दिन में हमसायों से पूछना, हाय, हाय, 

    दम-ए-वापसीं बरसर-ए-राह है 
    अज़ीज़ो अब अल्लाह ही अल्लाह है 
    ‎ 
    ‎(हुज़्निया मूसीक़ी आहिस्ता-आहिस्ता कम होती जाती है)‎

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