सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

इक़बाल बहुआयामी महत्व के कवि हैं। उन की कविता के विषय, और उनके शाश्वत-मार्गदर्शक जैसे स्वर ने हमेशा युवाओं की पीढ़ियों को प्रेरित किया है। अगर आप अभी तक इक़बाल की शायरी से अपरिचित हैं तो इस संग्रह से इक़बाल को पढ़ना शुरू' करें और शायरी के एक नए आयाम का अनुभव करें।

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं

अल्लामा इक़बाल

नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर

तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में

अल्लामा इक़बाल

ग़ुलामी में काम आती हैं शमशीरें तदबीरें

जो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें

अल्लामा इक़बाल

अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी

ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में नूरी है नारी है

अल्लामा इक़बाल

उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में

नज़र आती है उन को अपनी मंज़िल आसमानों में

अल्लामा इक़बाल

बातिल से दबने वाले आसमाँ नहीं हम

सौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमारा

अल्लामा इक़बाल

तिरे आज़ाद बंदों की ये दुनिया वो दुनिया

यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी

अल्लामा इक़बाल

अनोखी वज़्अ' है सारे ज़माने से निराले हैं

ये आशिक़ कौन सी बस्ती के या-रब रहने वाले हैं

अल्लामा इक़बाल

बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ

कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर

अल्लामा इक़बाल

तू ने ये क्या ग़ज़ब किया मुझ को भी फ़ाश कर दिया

मैं ही तो एक राज़ था सीना-ए-काएनात में

अल्लामा इक़बाल

पूछो मुझ से लज़्ज़त ख़ानमाँ-बर्बाद रहने की

नशेमन सैकड़ों मैं ने बना कर फूँक डाले हैं

अल्लामा इक़बाल

उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं

कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल बन जाए

अल्लामा इक़बाल

आँख जो कुछ देखती है लब पे सकता नहीं

महव-ए-हैरत हूँ कि दुनिया क्या से क्या हो जाएगी

अल्लामा इक़बाल

जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों में ज़मीनों में

वो निकले मेरे ज़ुल्मत-ख़ाना-ए-दिल के मकीनों में

अल्लामा इक़बाल

ये काएनात अभी ना-तमाम है शायद

कि रही है दमादम सदा-ए-कुन-फ़यकूँ

अल्लामा इक़बाल

गुज़र जा अक़्ल से आगे कि ये नूर

चराग़-ए-राह है मंज़िल नहीं है!

अल्लामा इक़बाल

नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोई गोशा-ए-फ़राग़त

ये जहाँ अजब जहाँ है क़फ़स आशियाना

अल्लामा इक़बाल

पुराने हैं ये सितारे फ़लक भी फ़र्सूदा

जहाँ वो चाहिए मुझ को कि हो अभी नौ-ख़ेज़

अल्लामा इक़बाल

चमन-ज़ार-ए-मोहब्ब्बत में ख़मोशी मौत है बुलबुल

यहाँ की ज़िंदगी पाबंदी-ए-रस्म-ए-फ़ुग़ाँ तक है

अल्लामा इक़बाल

ख़िर्द-मंदों से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है

कि मैं इस फ़िक्र में रहता हूँ मेरी इंतिहा क्या है

अल्लामा इक़बाल

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