ऐश मेरठी के शेर
करूँ किस का गिला कहते हुए भी शर्म आती है
रक़ीब अफ़्सोस अपने ही पुराने आश्ना निकले
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उठाने वाले हमें बज़्म से ज़रा ये देख
कि टूटता है ग़रीबों का आसरा कैसे
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मेरी जन्नत तिरी निगाह-ए-करम
मुझ से फिर जाए ये ख़ुदा न करे
न मिलने पर भी उसे 'ऐश' प्यार करता हूँ
यूँ ऊँचा कर दिया मेआ'र-ए-ज़िंदगी मैं ने
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बढ़ती रही निगाह बहकते रहे क़दम
गुज़रा है इस तरह भी ज़माना शबाब का
ये भी कोई ज़िंदगी में ज़िंदगी है हम-नफ़स
दिल कहीं है हम कहीं हैं और जानाना कहीं
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साइल आया है तिरे दर पे ख़ुदी को खो कर
देखना है मुझे क्या आज 'अता होता है
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आँखों को तमन्ना है ख़ाक-ए-दर-ए-जानाँ की
ख़ाक-ए-दर-ए-हर-कूचा इक्सीर नहीं होती
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