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अज़हर इनायती

1946 | रामपुर, भारत

रामपूर स्कूल के प्रमुख शायर/ महशर इनायती के शागिर्द

रामपूर स्कूल के प्रमुख शायर/ महशर इनायती के शागिर्द

अज़हर इनायती

ग़ज़ल 44

अशआर 47

हर एक रात को महताब देखने के लिए

मैं जागता हूँ तिरा ख़्वाब देखने के लिए

ये और बात कि आँधी हमारे बस में नहीं

मगर चराग़ जलाना तो इख़्तियार में है

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अपनी तस्वीर बनाओगे तो होगा एहसास

कितना दुश्वार है ख़ुद को कोई चेहरा देना

ग़ज़ल का शेर तो होता है बस किसी के लिए

मगर सितम है कि सब को सुनाना पड़ता है

शिकस्तगी में भी क्या शान है इमारत की

कि देखने को इसे सर उठाना पड़ता है

पुस्तकें 10

 

वीडियो 17

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ऑडियो 11

अपने आँचल में छुपा कर मिरे आँसू ले जा

क़यामत आएगी माना ये हादिसा होगा

किताबें जब कोई पढ़ता नहीं था

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