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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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गोविन्द गुलशन

1957 - 2026 | ग़ाज़ियाबाद, भारत

गोविन्द गुलशन के शेर

पहले तलाश कीजिए मंज़िल की रहगुज़र

फिर सोचिए कि राह में दीवार कौन है

ज़िद पर अड़े हुए हैं ये दिल भी दिमाग़ भी

अब देखना है इन में असर-दार कौन है

रहगुज़र है उदास मेरी तरह

जाने कब वो यहाँ से गुज़रेगा

फिर मुझे याद आएगा बचपन

इक ज़माना गुमाँ से गुज़रेगा

ज़ेहन और दिल में जो अन-बन है वो अन-बन रहे

इस लिए दरमियाँ दीवार बना रक्खी है

एक मुश्किल हो तो आसान बना ली जाए

उस ने तो ज़िंदगी दुश्वार बना रक्खी है

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