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राही फ़िदाई

1949 | बैंगलोर, भारत

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हर एक शाख़ थी लर्ज़ां फ़ज़ा में चीख़-ओ-पुकार

हवा के हाथ में इक आब-दार ख़ंजर था

लज़्ज़त का ज़हर वक़्त-ए-सहर छोड़ कर कोई

शब के तमाम रिश्ते फ़रामोश कर गया

आप ने अच्छा किया ततहीर-ए-ख़्वाहिश ही की

वर्ना ज़मज़म चश्मा-ए-नापाक होता ग़ालिबन

ये कैसा गुल खिलाया है शजर ने

समर बनने को ग़ुंचा मुंतज़िर है

बराए-नाम ही सही ब-एहतियात कीजिए

दरून-ए-किज़्ब-ओ-इफ़्तिरा सदाक़तें ख़लत-मलत

सब्ज़ा-ज़ारों की शराफ़त से खेलो क़तअन

तुम हवा हो तो ख़लाओं से लिपट कर देखो

किसी को साया किसी को गुल-ओ-समर देगा

हरा-भरा है दरख़्त-ए-रिवाज रहने दो

हवस-गिरफ़्ता हवाओ निगाहें नीची रखो

शजर खड़े हैं सड़क के क़रीन बे-पर्दा

शराफ़तों के रंग में शरारतें ख़लत-मलत

सर-ए-मज़ाक़ हो गईं हिमाक़तें ख़लत-मलत

हादसों के ख़ौफ़ से एहसास की हद में था

वर्ना नफ़्स-ए-मुतमइन सफ़्फ़ाक होता ग़ालिबन