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साइल देहलवी

1864 - 1945 | दिल्ली, भारत

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मालूम नहीं किस से कहानी मिरी सुन ली

भाता ही नहीं अब उन्हें अफ़्साना किसी का

ख़त-ए-शौक़ को पढ़ के क़ासिद से बोले

ये है कौन दीवाना ख़त लिखने वाला

मोहतसिब तस्बीह के दानों पे ये गिनता रहा

किन ने पी किन ने पी किन किन के आगे जाम था

हमेशा ख़ून-ए-दिल रोया हूँ मैं लेकिन सलीक़े से

क़तरा आस्तीं पर है धब्बा जैब दामन पर

झड़ी ऐसी लगा दी है मिरे अश्कों की बारिश ने

दबा रक्खा है भादों को भुला रक्खा है सावन को

आह करता हूँ तो आते हैं पसीने उन को

नाला करता हूँ तो रातों को वो डर जाते हैं

ये मस्जिद है ये मय-ख़ाना तअ'ज्जुब इस पर आता है

जनाब-ए-शैख़ का नक़्श-ए-क़दम यूँ भी है और यूँ भी

हैं ए'तिबार से कितने गिरे हुए देखा

इसी ज़माने में क़िस्से इसी ज़माने के

जनाब-ए-शैख़ मय-ख़ाने में बैठे हैं बरहना-सर

अब उन से कौन पूछे आप ने पगड़ी कहाँ रख दी

शबाब कर दिया मेरा तबाह उल्फ़त ने

ख़िज़ाँ के हाथ की बोई हुई बहार हूँ मैं

खिल गई शम्अ तिरी सारी करामात-ए-जमाल

देख परवाने किधर खोल के पर जाते हैं

तुम आओ मर्ग-ए-शादी है आओ मर्ग-ए-नाकामी

नज़र में अब रह-ए-मुल्क-ए-अदम यूँ भी है और यूँ भी

तुम्हें परवा हो मुझ को तो जिंस-ए-दिल की परवा है

कहाँ ढूँडूँ कहाँ फेंकी कहाँ देखूँ कहाँ रख दी