aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
अगर ये ज़िद है कि मुझ से दुआ सलाम न हो
तो ऐसी राह से गुज़रो जो राह-ए-आम न हो
ख़ुद रहम कीजिए दिल-ए-उम्मीद-वार पर
आफी निकालिए कोई सूरत निबाह की
चश्म-ए-तर पर गर नहीं करता हवा पर रहम कर
दे ले साक़ी हम को मय ये अब्र-ए-बाराँ फिर कहाँ
रहम कर मस्तों पे कब तक ताक़ पर रक्खेगा तू
साग़र-ए-मय साक़िया ज़ाहिद का ईमाँ हो गया
इक काफ़िर-ए-मुतलक़ है ज़ुल्मत की जवानी भी
बे-रहम अँधेरा है शमएँ हैं न परवाने
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