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जमील मुरस्सापुरी

1931 | मुंबई, भारत

ग़ज़ल 4

 

शेर 6

अगर ये ज़िद है कि मुझ से दुआ सलाम हो

तो ऐसी राह से गुज़रो जो राह-ए-आम हो

ये कैसा वक़्त मुझ पर गया है

मिरे क़द से मिरा साया बड़ा है

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ये दौर भी क्या दौर है इस दौर में यारो

सच बोलने वालों का ही अंजाम बुरा है

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