aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
तमाम उम्र इसी एहतियात में गुज़री
कि आशियाँ किसी शाख़-ए-चमन पे बार न हो
शहर-वालों की मोहब्बत का मैं क़ाएल हूँ मगर
मैं ने जिस हाथ को चूमा वही ख़ंजर निकला
कल थके-हारे परिंदों ने नसीहत की मुझे
शाम ढल जाए तो 'मोहसिन' तुम भी घर जाया करो
मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ
जिस तरह साया-ए-दीवार पे दीवार गिरे
शहर में किस से सुख़न रखिए किधर को चलिए
इतनी तन्हाई तो घर में भी है घर को चलिए
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