aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
मिरे अज़ीज़ ही मुझ को समझ न पाए कभी
मैं अपना हाल किसी अजनबी से क्या कहता
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
बिजली चमकी तो अब्र रोया
याद आ गई क्या हँसी किसी की
जब तुम से मोहब्बत की हम ने तब जा के कहीं ये राज़ खुला
मरने का सलीक़ा आते ही जीने का शुऊर आ जाता है
और क्या इस से ज़ियादा कोई नर्मी बरतूँ
दिल के ज़ख़्मों को छुआ है तिरे गालों की तरह
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