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ऐन ताबिश

1958 | गया, भारत

प्रसिद्ध समकालीन शायर, अपनी नज़्मों के लिए मशहूर

प्रसिद्ध समकालीन शायर, अपनी नज़्मों के लिए मशहूर

ऐन ताबिश

ग़ज़ल 30

नज़्म 20

अशआर 14

है एक ही लम्हा जो कहीं वस्ल कहीं हिज्र

तकलीफ़ किसी के लिए आराम किसी का

जहाँ अपने अज़ीज़ों की दीद होती है

ज़मीन-ए-हिज्र पे भी कोई ईद होती है

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जी लगा रक्खा है यूँ ताबीर के औहाम से

ज़िंदगी क्या है मियाँ बस एक घर ख़्वाबों का है

रोज़ इक मर्ग का आलम भी गुज़रता है यहाँ

रोज़ जीने के भी सामान निकल आते हैं

बे-हुनर देख सकते थे मगर देखने आए

देख सकते थे मगर अहल-ए-हुनर देख पाए

रेखाचित्र 1

 

पुस्तकें 9

 

वीडियो 13

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ऑडियो 11

आवारा भटकता रहा पैग़ाम किसी का

ख़ाकसारी थी कि बिन देखे ही हम ख़ाक हुए

ग़ुबार-ए-जहाँ में छुपे बा-कमालों की सफ़ देखता हूँ

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