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ऐन ताबिश

1958 | पटना, भारत

प्रसिद्ध समकालीन शायर, अपनी नज़्मों के लिए मशहूर

प्रसिद्ध समकालीन शायर, अपनी नज़्मों के लिए मशहूर

ग़ज़ल 16

नज़्म 11

शेर 14

जी लगा रक्खा है यूँ ताबीर के औहाम से

ज़िंदगी क्या है मियाँ बस एक घर ख़्वाबों का है

बे-हुनर देख सकते थे मगर देखने आए

देख सकते थे मगर अहल-ए-हुनर देख पाए

एक ख़ुश्बू थी जो मल्बूस पे ताबिंदा थी

एक मौसम था मिरे सर पे जो तूफ़ानी था

पुस्तकें 6

Aadmi Udas Hai

 

2002

Ashk Asa Ne Nahr Nikali

 

2004

दश्त अजब हैरानी का

 

2013

Rat Ke Aakhir Hote Hote

 

1988

Us Khushboo Ka Ye Qissa Hai

 

1991

 

वीडियो 13

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
Kahaniya tamam shab tamam shab kahaniya

Eminent poet, writer Ain Tabish who is a professor by profession is at Rekhta studio. Ain Tabish is different from other poets of his generation. He started writing when modern poetry was at its peak yet he is more inclined to traditional and classical poetry which exhibit from his works. ऐन ताबिश

आवारा भटकता रहा पैग़ाम किसी का

ऐन ताबिश

आँसुओं के रतजगों से

सारे मंज़र एक जैसे ऐन ताबिश

इक शहर था इक बाग़ था

इक शहर था इक बाग़ था ऐन ताबिश

ख़ाकसारी थी कि बिन देखे ही हम ख़ाक हुए

ऐन ताबिश

ग़ुबार-ए-जहाँ में छुपे बा-कमालों की सफ़ देखता हूँ

ऐन ताबिश

घनी सियह ज़ुल्फ़ बदलियों सी बिला सबब मुझ में जागती है

ऐन ताबिश

बदलने का कोई मौसम नहीं होता

चले थे लोग जब घर से ऐन ताबिश

मेरी तन्हाई के एजाज़ में शामिल है वही

ऐन ताबिश

यहाँ के रंग बड़े दिल-पज़ीर हुए हैं

ऐन ताबिश

वही जुनूँ की सोख़्ता-जानी वही फ़ुसूँ अफ़्सानों का

ऐन ताबिश

हयात-ए-सोख़्ता-सामाँ इक इस्तिअा'रा-ए-शाम

ऐन ताबिश

ऑडियो 11

आवारा भटकता रहा पैग़ाम किसी का

यहाँ के रंग बड़े दिल-पज़ीर हुए हैं

वही जुनूँ की सोख़्ता-जानी वही फ़ुसूँ अफ़्सानों का

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI