कलीमुद्दीन अहमद के लेख
दास्तान क्या है?
"दास्तान-तराज़ी (दास्तान लिखना) साहित्य की कलाओं में से एक है, सच है कि दिल बहलाने के लिए अच्छी कला है।" — ग़ालिब "एक था बादशाह, हमारा तुम्हारा ख़ुदा बादशाह, ख़ुदा का रसूल बादशाह, चिड़िया लाई मूंग का दाना, चिड़ा लाया चावल का दाना, दोनों ने मिल कर
रिवायात और उर्दू शायरी
1 / 6 उर्दू शायरी को दो अलग-अलग रवायतें (परंपराएं) विरासत में मिलीं। एक तरफ़ तो फ़ारसी रवायतें थीं जिनमें अरबी रंग मिला हुआ था और दूसरी तरफ़ भाषा और संस्कृत की रवायतें जिनकी जड़ें हिंदुस्तान की प्राकृतिक, सामाजिक और धार्मिक विशेषताओं में दूर-दूर तक
तहलील-ए-नफ़्सी और फ़न
(क) यह दावा किया जाता है कि मनोविश्लेषण "उन कारकों को उजागर कर सकता है जो एक इंसान को कलात्मक दृष्टि से रचनाकार बनाते हैं।" अगर मनोविश्लेषण कुछ न करके सिर्फ़ यही करता तो वह साहित्यिक आलोचना और मानवता दोनों की तरफ़ से बधाई का पात्र होता। दुनिया बहुत
अलफ़ाज़ और शायरी
शब्दों और शायरी में एक अटूट संबंध है। उर्दू शायर इस संबंध से पूरी तरह अनजान नज़र आते हैं। शायरी की मंज़िलें तय करने के लिए शब्दों के मार्गदर्शन की ज़रूरत है। अगर शब्द मार्गदर्शक न हों तो कदम आगे नहीं बढ़ सकता है, लेकिन मार्गदर्शक को ही मंज़िल समझ लेना
दास्तान की टेक्निक
"लखनऊ से बढ़कर दास्तान-गोई का चर्चा शायद ही कहीं और होगा। बीस-पच्चीस सच्चे यार और हमख़याल दोस्त रात के वक़्त, जो आशिक़ों का पर्दादार है, एक जगह पर जमा हुए। कोई गन्ना छील रहा है, कोई पोंडे पर चाकू तेज़ कर रहा है। जगह-जगह प्यालियों में अफ़ीम घुल रही है। हक़ीक़त
फ़न का एक नज़रिया
1 / 4 कला कोई बनावटी चीज़ नहीं है। यह कोई अस्वाभाविक पैदावार नहीं है जिसे हमारी स्वाभाविक शुरुआती प्रेरणाओं की अस्वाभाविक रोकथाम के ज़रिए वजूद में लाया जाता है। यह ज़रूरी तौर पर इंसानी पैदावार है। जानवरों की दुनिया में इसका कोई मक़ाम नहीं है और यह संस्कृति
शे'रियत क्या है?
सुरूर साहब कहते हैं, " 'मुआसिर' के नज़्म (कविता) वाले हिस्से में शेरियत कम है। शेरियत से मेरा मतलब वह रसीलापन नहीं है जिसकी तरफ़ आपने इशारा किया है बल्कि जज़्बात की शिद्दत (गहराई), वह दीवानगी की कैफ़ियत, बात को इस तरह कहने की आदत कि पढ़ने वाला थोड़ी
रेडियो और कल्चर
(1) साइंस की तरक़्क़ी ने सारी दुनिया ही बदल दी है लेकिन यह साइंस कोई नई चीज़ नहीं। जब इंसान ने पहली बार आसपास की चीज़ों से अपने आराम, अपनी तरक़्क़ी के लिए काम लेना शुरू किया, उस वक़्त साइंस ने जन्म लिया। इस तरक़्क़ी की रफ़्तार बहुत सुस्त रही। नई जानकारियों
फ़ंकार और ला-शऊर
फ्रायड लिखते हैं कि "आप इस भ्रम के शिकार हैं कि आपको मनोवैज्ञानिक आज़ादी हासिल है और आप इससे पीछे हटना नहीं चाहते। मुझे यह कहते हुए अफ़सोस होता है कि यहाँ पर आपके नज़रिए से मुझे असहमति है।" फ्रायड की विचारधारा आज़ादी को ख़ारिज करती है और यह दावा करती है कि