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मिर्ज़ा हादी रुस्वा

1858 - 1931 | लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 3

 

शेर 18

दिल्ली छुटी थी पहले अब लखनऊ भी छोड़ें

दो शहर थे ये अपने दोनों तबाह निकले

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लब पे कुछ बात आई जाती है

ख़ामुशी मुस्कुराई जाती है

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देखा है मुझे अपनी ख़ुशामद में जो मसरूफ़

इस बुत को ये धोका है कि इस्लाम यही है

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बा'द तौबा के भी है दिल में ये हसरत बाक़ी

दे के क़स्में कोई इक जाम पिला दे हम को

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क्या कहूँ तुझ से मोहब्बत वो बला है हमदम

मुझ को इबरत हुई ग़ैर के मर जाने से

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पुस्तकें 24

अख़तरी बेग़म

 

1952

Bahram Ki Rihayi

 

 

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1987

Khooni Joru

 

 

Khuni Aashiq

 

1987

लैला मजनू

 

1963

Mirza Hadi Ruswa

 

1985

Mirza Ruswa Ke Novelon Ke Niswani Kirdar

 

1995

मिर्ज़ा रुसवा के तंक़ीदी मुरासलात

 

1961

Muraqqa Laila Majnun

 

1963

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