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अफ़सर अब्बास ज़ैदी का परिचय
पहचान: प्रसिद्ध मनक़बती शायर और ख़तीब, जिन्होंने लाहौर की धार्मिक और अदबी महफ़िलों में अपने क़त्आत और मनक़बतों के माध्यम से विशेष स्थान प्राप्त किया।
अफ़सर अब्बास ज़ैदी का जन्म 2 फ़रवरी 1928 को दिल्ली के ऐतिहासिक मुहल्ले सुई वालाँ (जामा मस्जिद के आसपास) में मौलाना अकबर अब्बास ज़ैदी और अमीर बानो बेगम के यहाँ हुआ। उनका संबंध एक ऐसे परिवार से था जिसकी पहचान धार्मिक और विद्वत परंपरा से थी। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा फ़तहपुरी मुस्लिम हाई स्कूल, दिल्ली से प्राप्त की और 1945 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। बाद में वे एंग्लो-अरबी कॉलेज, अजमेरी गेट में अध्ययन कर रहे थे कि उपमहाद्वीप की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और आर्थिक जिम्मेदारियों के कारण उन्हें टेलीफ़ोन और टेलीग्राफ विभाग में नौकरी करनी पड़ी।
भारत के विभाजन के बाद वे लाहौर चले गए, जहाँ उन्होंने नौकरी के साथ-साथ अपनी शिक्षा भी जारी रखी। 1954 में उन्होंने University of the Punjab से फ़ारसी में “मुंशी फ़ाज़िल” की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने एफ.ए., बी.ए. और उर्दू साहित्य में एम.ए. की डिग्री भी हासिल की।
अफ़सर अब्बास ज़ैदी ने शायरी की शुरुआत ग़ज़ल से की, लेकिन शीघ्र ही वे रसायी और मनक़बती शायरी की ओर मुड़ गए। लाहौर की धार्मिक महफ़िलों में उनके क़त्आत और मनक़बतें अत्यंत लोकप्रिय हुईं और उन्हें पंजाब भर की महफ़िलों में आमंत्रित किया जाता था। अहल-ए-बै़त की प्रशंसा में कहे गए उनके क़त्आत श्रोताओं में बेहद लोकप्रिय हुए और उन्हें “अफ़सर-उश-शुअरा” के ख़िताब से भी याद किया जाने लगा।
उनकी प्रमुख कृतियों में हदिया-ए-तबरीक, ख़िराज-ए-अक़ीदत, अहादीस-ए-किसा (मंज़ूम), मेहराब-ए-हरम, क़िरतास-ओ-क़लम, महशर-ए-ख़ामोश, नुक़्ता-ए-परकार-ए-हक़ और इज़्न-ए-विज़दान शामिल हैं। इनमें महशर-ए-ख़ामोश को विशेष लोकप्रियता प्राप्त हुई। वे लंबे समय तक Imamia Mission Pakistan के सचिव रहे और उसके पत्र पयाम-ए-महफ़िल का संपादन भी करते रहे। इस दौरान उन्होंने अरबी और फ़ारसी के कई महत्वपूर्ण ग्रंथों का उर्दू में अनुवाद भी किया।
उनकी शायरी का केंद्रीय विषय हज़रत अली और अहल-ए-बै़त के प्रति गहरी श्रद्धा और प्रेम रहा।
निधन: अफ़सर अब्बास ज़ैदी का निधन 6 अगस्त 2004 को लाहौर में
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