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अशफ़ाक़ शाहीन के शेर

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इतनी ज़मीं ही चाहिए बस मुझ को गाँव में

जा कर पड़ा रहूँ मैं जहाँ माँ के पाँव में

हम तिरे हिज्र में यूँ ज़र्द हुए जाते हैं

लोग तकते हैं तो हमदर्द हुए जाते हैं

आती कब है रोज़ बुलाना पड़ती है

नींद की ख़ातिर गोली खाना पड़ती है

इरादे गरचे लहरों के बड़े सदमात वाले हैं

ये दरिया को बता देना कि हम गुजरात वाले हैं

सुब्ह-ए-नौ के वास्ते बेकार हूँ

मैं गुज़िश्ता रोज़ का अख़बार हूँ

मैं अध-मरा गुलाब सर-ए-शाख़-ए-नीम-जाँ

हाथों से तू ने मुझ को सँवारा तो मैं गया

मैं कच्ची रौशनाई से बने इक शहर जैसा हूँ

किसी का अश्क काफ़ी है मुझे मिस्मार करने को

'अर्सा हुआ है उन से मुलाक़ात ही नहीं

गुजरात लग रहा है कि गुजरात ही नहीं

अकेला रहा है या उन्हें भी साथ लाता है

ज़रा पूछो ख़बर तो लो दिसम्बर क्या बताता है

किसी कर्ब-ए-मुसलसल के खुले इज़हार जैसे हैं

यहाँ लोगों के चेहरे भी किसी अख़बार जैसे हैं

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