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हुमायूँ इक़बाल का परिचय
पहचान: जासूसी और ऐतिहासिक उपन्यासकार, संपादक, कवि
हुमायूँ इक़बाल, जो साहित्यिक दुनिया में “एच. इक़बाल” के नाम से मशहूर हुए, 6 जुलाई 1941 को उत्तर भारत के शहर रामपुर में पैदा हुए। बँटवारे के बाद उनका परिवार कराची चला गया, जहाँ किताबों और लाइब्रेरियों के माहौल ने पढ़ने का उनका शौक़ जुनून बना दिया।
उन्हें औपचारिक पढ़ाई से ज़्यादा किताबों से लगाव था। जवानी में वे रोज़ किराये की लाइब्रेरी से उपन्यास लाते थे। एक बार बहुत कमज़ोर जासूसी उपन्यास पढ़कर उन्होंने कहा, “इससे बेहतर तो मैं खुद लिख सकता हूँ।” इसी तरह उनका पहला उपन्यास मज़लूम लुटेरे लिखा गया। जब यह छपा तो लेखक का नाम “एच. इक़बाल” दिया गया और यही नाम उनकी पहचान बन गया।
उस समय इब्ने सफ़ी की इमरान सीरीज़ बहुत लोकप्रिय थी। जब इब्ने सफ़ी बीमार हुए और नई किताबें आना बंद हो गईं तो कई लेखकों ने इमरान पर लिखना शुरू किया। हुमायूँ इक़बाल भी उनमें थे, लेकिन उनकी भाषा, मज़बूत कहानी और असरदार संवाद उन्हें अलग बनाते थे। जब इब्ने सफ़ी ठीक होकर लौटे तो इन्होंने सम्मान में इमरान सीरीज़ लिखना छोड़ दिया और अपना अलग रास्ता चुना।
उन्होंने अपना नया किरदार “मेजर परमोड” बनाया जो आगे चलकर पूरी सीरीज़ बन गया। यह किरदार इमरान जितना मशहूर तो न हो सका, लेकिन उर्दू जासूसी साहित्य में एक जाना-पहचाना नाम बन गया और कई बड़े लेखकों ने भी इस पर लिखा।
संपादक के रूप में उनकी सबसे बड़ी कामयाबी अलिफ लैला डाइजेस्ट थी। इसमें छपने वाली उनकी धारावाहिक कहानी छलावा बहुत लोकप्रिय हुई। शुरू में यह “सबीहा बानो” नाम से छपती रही, बाद में पता चला कि असली लेखक खुद एच. इक़बाल थे। डाइजेस्ट की बिक्री पचास हज़ार से ऊपर पहुँच गई, मगर ज़्यादा काम और बीमारी की वजह से उन्हें एक साल का आराम करना पड़ा। वापसी पर पत्रिका पहले जैसी ऊँचाई हासिल न कर सकी और आर्थिक दिक्कतें बढ़ गईं।
इसके बाद उन्होंने बड़े साइज का नया मासिक नई नस्लें शुरू किया, जिसने जोरदार शुरुआत की, लेकिन बार-बार सरकारी रोक लगने से वह भी बंद हो गया। इसके बाद उन्होंने डाइजेस्ट निकालना छोड़कर सिर्फ लिखने पर ध्यान दिया।
वे बहुमुखी प्रतिभा के मालिक थे। जासूसी और ऐतिहासिक उपन्यासों के साथ उन्हें कविता और संगीत से भी गहरा लगाव था। उनकी किताब अबजद-ए-म्यूज़िक संगीत सीखने वालों के लिए आसान और उपयोगी मार्गदर्शक मानी जाती है।
उन्होंने लगभग डेढ़ सौ उपन्यास लिखे, हालाँकि समय और हालात की वजह से कई पांडुलिपियाँ सुरक्षित न रह सकीं। उनकी कोई संतान नहीं थी। पत्नी की मृत्यु ने उन्हें बहुत दुखी कर दिया। आख़िरी वर्षों में बीमारी और तंगी भी रही, फिर भी उनकी रचनात्मक गरिमा बनी रही।
उर्दू जासूसी साहित्य में आम राय है कि इब्ने सफ़ी के बाद मज़हर कलीम और हुमायूँ इक़बाल सबसे बड़े नाम हैं। किराये की लाइब्रेरियों से लेकर डाइजेस्टों के सुनहरे दौर तक उनकी लिखावट ने लाखों पाठकों को मोहित किया।
निधन: 14 अप्रैल 2025 को कराची में उनका निधन हुआ।
सहायक लिंक : | https://ur.wikipedia.org/wiki/%D8%A7%DB%8C%DA%86_%D8%A7%D9%82%D8%A8%D8%A7%D9%84
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