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मजरूह सुल्तानपुरी

1919 - 2000 | मुंबई, भारत

भारत के सबसे प्रमुख प्रगतिशील ग़ज़ल-शायर/प्रमुख फि़ल्म गीतकार/दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित

भारत के सबसे प्रमुख प्रगतिशील ग़ज़ल-शायर/प्रमुख फि़ल्म गीतकार/दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित

मजरूह सुल्तानपुरी

ग़ज़ल 53

अशआर 44

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

ऐसे हँस हँस के देखा करो सब की जानिब

लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं

देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार

रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर देख

कोई हम-दम रहा कोई सहारा रहा

हम किसी के रहे कोई हमारा रहा

शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में पूछ कैसे सहर हुई

कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया

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लोरी 1

 

गीत 6

फ़िल्मी गीत 15

पुस्तकें 15

चित्र शायरी 14

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ऑडियो 51

अब अहल-ए-दर्द ये जीने का एहतिमाम करें

अहल-ए-तूफ़ाँ आओ दिल-वालों का अफ़्साना कहें

आ निकल के मैदाँ में दो-रुख़ी के ख़ाने से

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