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मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
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हमें स्वर्ग (जन्नत) की असलियत के बारे में सब पता है, लेकिन...
हे 'ग़ालिब', दिल को बहलाने और खुश रखने के लिए यह विचार अच्छा है।
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इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के
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प्रेम ने 'ग़ालिब' को निकम्मा और बेकार बना दिया है।
वरना हम भी बहुत काम के और काबिल इंसान हुआ करते थे।
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उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
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उन्हें देखते ही मेरे चेहरे पर अचानक चमक आ जाती है।
वे मान लेते हैं कि बीमार की हालत अब अच्छी है।
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टैग : ज़र्बुल-मसल
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मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
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प्रेम में जीना और मरना अलग नहीं लगता, दोनों एक जैसे हो जाते हैं।
हम उसी को देखकर जीते हैं जिसके रूखेपन से हमारी सांस छूट सकती है।
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पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
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वह (महबूब) जानबूझकर अनजान बनकर पूछ रहे हैं कि यह 'ग़ालिब' आखिर है कौन?
अब कोई मुझे सलाह दो कि ऐसे सवाल पर मैं उन्हें क्या जवाब दूँ?
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इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं
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हे ईश्वर, महबूब के इस भोलेपन पर भला कौन अपनी जान न न्योछावर कर दे?
वे मुझसे लड़ तो रहे हैं, लेकिन उनके हाथ में कोई तलवार भी नहीं है।
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रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
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हम खून के सिर्फ नसों में दौड़ते रहने को कुछ नहीं मानते।
अगर खून आँखों से (आँसू बनकर) नहीं टपका, तो फिर वह खून कहलाने लायक नहीं है।
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की मिरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना
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मेरे कत्ल के बाद महबूब ने ज़ुल्म न करने की कसम खाई है।
अफ़सोस, उस 'जल्दी पछताने वाले' का यह पछतावा अब किस काम का?
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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
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मेरी इच्छाएँ हज़ारों हैं, और हर इच्छा इतनी तीखी है कि जैसे साँस ही रुक जाए।
मेरे बहुत से अरमान पूरे हुए, फिर भी मन को वे कम लगे।
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इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
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इश्क़ पर किसी का बस नहीं चलता; उसे ज़बरदस्ती न किया जा सकता है, न रोका जा सकता है।
ग़ालिब कहते हैं यह ऐसी आग है जो चाहो तब भी न लगे, और लग जाए तो बुझती नहीं।
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हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक
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मैं मानता हूँ कि तुम हमेशा मुझे अनदेखा नहीं करोगे।
लेकिन जब तक तुम्हें मेरी खबर होगी, तब तक मैं मिट्टी हो चुका होऊँगा।
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रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं
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जब इंसान दुख का आदी हो जाता है, तो दुख का असर घट जाता है।
मुझ पर इतनी परेशानियाँ आईं कि वे मुझे आसान लगने लगीं।
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टैग : प्रेरणादायक
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हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
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इस दुनिया में कविता कहने वाले और भी बहुत से गुणी लोग मौजूद हैं।
लेकिन लोग कहते हैं कि ग़ालिब के बात करने का अंदाज़ सबसे निराला है।
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टैग : तअल्ली
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जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए
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मेरा दिल फिर वही फुर्सत ढूँढता है जो दिन-रात मिल सके।
ताकि मैं बस बैठा रहूँ और प्रियतम की छवि मन में बनाए रखूँ।
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वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं
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वे हमारे घर आ गए हैं, यह तो ईश्वर का चमत्कार लगता है।
कभी मैं उन्हें देखता हूँ, कभी अपने घर को, जैसे भरोसा ही नहीं होता।
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बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'
कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है
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ग़ालिब, मेरी यह बेहोशी यूँ ही बिना कारण नहीं है।
ज़रूर कुछ बात है जिसे छिपाकर रखा गया है।
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तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए'तिबार होता
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हम तुम्हारे वादे के सहारे जीते रहे, पर मान लो वह वादा झूठ निकला।
अगर उस पर सच में हमें विश्वास होता, तो हम खुशी से ही मर जाते।
ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता
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यह कैसी दोस्ती है कि दोस्त सहारा देने के बजाय नसीहत करने वाले बन गए हैं।
अगर दोस्ती सच्ची होती तो कोई उपाय करता और कोई मेरे दुख में साथ देता।
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
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हमें उनसे वफ़ादारी और साथ निभाने की उम्मीद है,
जो यह भी नहीं जानते कि वफ़ा का असल मतलब क्या है।
रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'
कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था
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हे ग़ालिब, तुम यह मत समझो कि उर्दू शायरी के गुरु सिर्फ़ तुम ही हो।
लोग कहते हैं कि पुराने ज़माने में 'मीर' नाम का भी कोई महान शायर था।
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'ग़ालिब' हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से
बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ाँ किए हुए
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ऐ ग़ालिब, मुझे मत छेड़ो क्योंकि आंसुओं के भारी आवेग के कारण,
मैं एक बड़ा तूफ़ान खड़ा करने का पक्का इरादा (तैयारी) किए बैठा हूँ।
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क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ
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जीवन की क़ैद और दुःख के बंधन असलियत में एक ही चीज़ हैं।
इसलिए मौत आने से पहले इंसान को दुःख से छुटकारा कैसे मिल सकता है?
ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान 'ग़ालिब'
तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता
Rekhta
AI Explanation
ऐ ग़ालिब! आध्यात्म के ये गहरे मुद्दे और तुम्हारे समझाने का यह अंदाज़ कमाल का है।
अगर तुम शराब पीने वाले न होते, तो हम तुम्हें ज़रूर एक संत मान लेते।
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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
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हमारे नसीब में यह नहीं लिखा था कि हमें अपने प्रियतम से मिलन प्राप्त होता।
अगर हम और ज़्यादा दिन ज़िंदा रहते, तो भी बस उनका इंतज़ार ही करते रहते।
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जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है
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जहाँ शरीर जल चुका है, वहाँ निश्चित रूप से दिल भी जल गया होगा।
अब तुम इस राख को क्यों कुरेद रहे हो, अब तुम क्या ढूँढ़ना चाहते हो?
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हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती
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हम ऐसी हालत में हैं कि हम खुद तक भी नहीं पहुँच पा रहे।
अपनी ही दशा की कोई जानकारी हमें नहीं मिलती।
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काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुम को मगर नहीं आती
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हे ग़ालिब, तुम किस मुँह से और किस हिम्मत से काबा (तीर्थ) जाओगे?
इतने पाप करने के बावजूद तुम्हें ज़रा भी शर्म नहीं आती।
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या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात
दे और दिल उन को जो न दे मुझ को ज़बाँ और
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हे प्रभु, वे मेरी बात न समझते हैं और न आगे समझेंगे।
उनको और बड़ा दिल दे, और मुझे ज़्यादा बोलने की शक्ति मत दे।
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बना कर फ़क़ीरों का हम भेस 'ग़ालिब'
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं
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ऐ 'ग़ालिब', हमने भिखारियों जैसा रूप बना लिया है।
ताकि हम दानी कहलाने वाले लोगों का तमाशा और व्यवहार देख सकें।
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न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
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जब इस दुनिया में कुछ नहीं था तब भी ईश्वर था, अगर सृष्टि न होती तो भी ईश्वर ही होता।
मेरे अपने वजूद (अस्तित्व) ने मुझे डुबो दिया, अगर मैं एक अलग इंसान न होता तो मैं परमात्मा ही होता।
Rekhta
AI Explanation
जब इस दुनिया में कुछ नहीं था तब भी ईश्वर था, अगर सृष्टि न होती तो भी ईश्वर ही होता।
मेरे अपने वजूद (अस्तित्व) ने मुझे डुबो दिया, अगर मैं एक अलग इंसान न होता तो मैं परमात्मा ही होता।
यह शेर सूफी दर्शन के उस विचार को दर्शाता है कि सब कुछ ईश्वर है। ग़ालिब अफसोस जताते हैं कि उनके अलग 'होने' या अस्तित्व ने उन्हें परमात्मा से जुदा कर दिया है। यदि उनका निर्माण न हुआ होता, तो वे उस परम सत्य का ही अटूट हिस्सा होते।
शफ़क़ सुपुरी
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हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है
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वह राजा का करीबी बन गया है, इसलिए अकड़कर घूमता है।
वरना इस शहर में 'ग़ालिब' की इज़्ज़त ही क्या रह जाती है?
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मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती
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मृत्यु का दिन और समय पहले से ही निश्चित है।
तो फिर ऐसा क्यों है कि पूरी रात मुझे नींद नहीं आती?
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इस शे’र की गिनती ग़ालिब के मशहूर अशआर में होती है। इस शे’र में ग़ालिब ने ख़ूब सारे संदर्भों का इस्तेमाल किया है, जैसे दिन के अनुरूप रात, मौत के संदर्भ से नींद। इस शे’र में ग़ालिब ने मानव मनोविज्ञान के एक अहम पहलू से पर्दा उठाकर एक नाज़ुक विषय स्थापित किया है। शे’र के शाब्दिक अर्थ तो ये हैं कि जबकि अल्लाह ने हर प्राणी की मौत का एक दिन निर्धारित किया है और मैं भी इस तथ्य से अच्छी तरह वाक़िफ़ हूँ, फिर मुझे रात भर नींद क्यों नहीं आती। ध्यान देने की बात ये है कि नींद को मौत का ही एक रूप माना जाता है। शे’र में ये रियायत भी ख़ूब है। मगर शे’र में जो परतें हैं उसकी तरफ़ पाठक का ध्यान तुरंत नहीं जाता। दरअसल ग़ालिब कहना चाहते हैं कि हालांकि अल्लाह ने मौत का एक दिन निर्धारित कर रखा है और मैं इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ हूँ कि एक न एक दिन मौत आही जाएगी फिर मौत के खटके से मुझे सारी रात नींद क्यों नहीं आती। अर्थात मौत का डर मुझे सोने क्यों नहीं देता।
शफ़क़ सुपुरी
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
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मेरे दिल से पूछो कि तुम्हारा अध-निकला तीर मुझे कैसे चोट दे रहा है।
अगर वह तीर जिगर के आर-पार चला जाता, तो यह लगातार चुभन न होती।
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AI Explanation
मेरे दिल से पूछो कि तुम्हारा अध-निकला तीर मुझे कैसे चोट दे रहा है।
अगर वह तीर जिगर के आर-पार चला जाता, तो यह लगातार चुभन न होती।
ग़ालिब यहाँ प्रेम-पीड़ा को ऐसे तीर से दिखाते हैं जो पूरा निकलता नहीं, इसलिए घाव बंद भी नहीं होता और दर्द बना रहता है। ‘आर-पार’ जाना एक साफ़, पूरा ज़ख्म है, पर ‘अध-निकला’ तीर अधूरी चोट का संकेत है। भाव यह है कि अनिश्चित, अधूरा दुख सबसे ज़्यादा तड़पाता है।
सैफ़ अज़हर
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इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
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पानी की बूंद की असली खुशी सागर में मिलकर अपना अस्तित्व मिटा देने में है।
जब दर्द हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तो वह खुद ही अपनी दवा बन जाता है।
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इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया
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इश्क़ (प्रेम) की वजह से ही मेरे स्वभाव को जीवन का असली आनंद मिला।
मुझे दर्द की दवा तो मिल गई, लेकिन साथ ही एक ऐसा दर्द मिला जिसका कोई इलाज नहीं है।
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता
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बहुत समय हो गया कि ग़ालिब चल बसे, फिर भी उनकी याद आती है।
उनकी यह आदत याद आती है कि हर बात पर कहते थे: अगर ऐसा होता तो फिर क्या होता?
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निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले
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हमने सुना है कि आदम को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया गया था।
लेकिन हम तुम्हारी गली से बहुत अपमानित होकर निकले।
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तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हज़ार
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तुम हज़ार साल तक सुरक्षित और स्वस्थ रहो।
और हर साल के दिन इतने ज़्यादा हों जैसे पचास हज़ार दिन हों।
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आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती
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पहले मुझे अपने दिल की खराब हालत देखकर हँसी आ जाया करती थी।
लेकिन अब दुख इतना बढ़ गया है कि किसी भी बात पर हँसी नहीं आती।
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आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
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एक दिल से निकली आह को अपना असर दिखाने के लिए पूरी उम्र चाहिए होती है।
लेकिन तुम्हारी उलझी हुई ज़ुल्फ़ों के सुलझने तक भला कौन जीवित रह सकता है?
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देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़
इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है
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AI Explanation
देखना यह है कि प्रेमियों को अपने पत्थर दिल महबूबों (बुत) से क्या फायदा या कृपा मिलती है।
क्योंकि एक पंडित (ज्योतिषी) ने भविष्यवाणी की है कि यह साल बहुत शुभ रहेगा।
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टैग : नया साल
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मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ क्या है
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मेरे पास भी बोलने की शक्ति है, मैं चुप हूँ लेकिन गूँगा नहीं हूँ।
मेरी बस यह कामना है कि काश तुम खुद पूछो कि मेरा मकसद क्या है।
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क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन
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हम उधार लेकर शराब पीते थे, फिर भी मन में कहते थे कि हाँ।
हमें लगता था कि हमारी भूख से पैदा हुई यह मदहोशी एक दिन असर दिखाएगी।
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बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
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हर काम का आसानी से हो जाना कितना मुश्किल है।
यहाँ तक कि एक 'आदमी' के लिए भी सच्चा 'इंसान' बनना आसान नहीं है।
ग़ालिब कहते हैं कि दुनिया में सरलता मिलना कठिन है। उन्होंने 'आदमी' (शारीरिक अस्तित्व) और 'इंसान' (नैतिक और मानवीय गुणों से पूर्ण) में अंतर किया है। जिस तरह हर काम आसान नहीं होता, वैसे ही जन्म से आदमी होने के बावजूद, उसमें मानवता के गुण पैदा करना एक अत्यंत कठिन साधना है।
मोहम्मद आज़म
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हर काम का आसानी से हो जाना कितना मुश्किल है।
यहाँ तक कि एक 'आदमी' के लिए भी सच्चा 'इंसान' बनना आसान नहीं है।
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टैग : इंसान
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गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मिरे आगे
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AI Explanation
भले ही मेरे हाथों में अब हिलने-डुलने की भी ताकत नहीं है, लेकिन मेरी आँखों में अब भी जान बाकी है।
इसलिए शराब के प्याले और सुराही को अभी मेरे सामने से मत हटाओ, उन्हें यहीं रहने दो।
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बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
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AI Explanation
मेरे लिए यह दुनिया बच्चों के खेल जैसी है।
मेरे सामने रात-दिन बस यही तमाशा चलता रहता है।
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता
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AI Explanation
मैं किससे कहूँ कि यह दुख की रात क्या है; यह तो बहुत बड़ी मुसीबत है।
अगर मरना बस एक ही बार होता, तो मुझे मरना बुरा क्यों लगता?
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हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता
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जब मरने के बाद हमारी इतनी बदनामी हुई, तो हम नदी में डूब क्यों न गए?
अगर ऐसा होता तो न हमारा जनाज़ा उठता और न ही कहीं हमारी क़ब्र होती।
शायर अफ़सोस जता रहा है कि मरने के बाद उसे ज़िल्लत उठानी पड़ी। वह कामना करता है कि काश वह डूब कर मर जाता, ताकि उसका शरीर ही न मिलता और उसका नामो-निशान मिट जाता। इस तरह न तो शव-यात्रा (जनाज़ा) निकलती और न ही कोई मज़ार बनता जो दुनिया वालों के लिए तमाशा बनता।
शफ़क़ सुपुरी
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जब मरने के बाद हमारी इतनी बदनामी हुई, तो हम नदी में डूब क्यों न गए?
अगर ऐसा होता तो न हमारा जनाज़ा उठता और न ही कहीं हमारी क़ब्र होती।
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जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे
क्या ख़ूब क़यामत का है गोया कोई दिन और
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विदा लेते समय तुम कहते हो कि हम क़यामत (प्रलय) के दिन मिलेंगे।
क्या ख़ूब बात है, जैसे क़यामत का दिन आज (जुदाई के दिन) के सिवा कोई और दिन है।
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ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे
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मेरा ईमान (धर्म) मुझे रोकता है, मगर कुफ़्र (अधर्म) मुझे अपनी तरफ़ खींच रहा है।
काबा मेरे पीछे छूट गया है और कलीसा (चर्च) मेरे सामने खड़ा है।
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टैग : कशमकश
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