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मोहम्मद इफ़्तिख़ार शफ़ी

1973 | पाकिस्तान

मोहम्मद इफ़्तिख़ार शफ़ी के शेर

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सुना है ऐसे भी होते हैं लोग दुनिया में

कि जिन से मिलिए तो तन्हाई ख़त्म होती है

हिजरत की घड़ी हम ने तिरे ख़त के अलावा

बोसीदा किताबों को भी सामान में रक्खा

था कोई वहाँ जो है यहाँ भी है वहाँ भी

जो हूँ मैं यहाँ हूँ मैं वहाँ कोई नहीं था

आओ निकलें शाम की ठंडी सड़क पर 'इफ़्तिख़ार'

ज़िंदगी से कुछ तो अपना राब्ता रह जाएगा

बुझते हुए दिए को बचा तो लिया मगर

देखी गई हम से हवा की शिकस्त भी

अपनी बातों का जाएज़ा भी ले

मेरा लहजा है क्यों करख़्त पूछ

रोज़ कहता हूँ कि दीवार को ऊँचा कर लें

मेरा हम-साया मिरी बात समझता ही नहीं

हिजरत की घड़ी हम ने तिरे ख़त के 'अलावा

बोसीदा किताबों को भी सामान में रक्खा

इक याद शब-ए-रफ़्ता के मरक़द पे चढ़ी याद

वर्ना ये चराग़ों का धुआँ कुछ भी नहीं है

मुझे पुकार के देखो इन्ही अँधेरों से

मैं अपने 'अह्द का रौशन-ख़याल आदमी हूँ

बाँसुरी बज रही थी दूर कहीं

रात किस दर्जा याद आए तुम

क़िस्सा-गो तू ने फ़रामोश किया है वर्ना

इस कहानी में तिरे साथ कहीं थे हम भी

मुझ को ये 'इल्म था कि वो मंज़र नहीं रहे

मैं फिर भी साहिवाल बड़ी देर तक रहा

बारिश की एक बूँद का गिरना था और फिर

मौसम में ए'तिदाल बड़ी देर तक रहा

मैं निकल आता हूँ बाज़ार के सन्नाटे में

घर में तो ख़ौफ़ का एहसास नहीं रहता है

जाने कौन सी रुत की सफ़ीर थी वो हवा

दरख़्त रो दिए जिस को सलाम करते हुए

कमाल दम-ए-वहशत कमाल हो गया है

हमारा ख़ुद से त'अल्लुक़ बहाल हो गया है

इसी ज़िंदगी में पलट के आना है एक दिन

सो मैं कोई साँस इधर उधर नहीं कर रहा

हिसार-ए-रेग में बरसों जला था मेरा वुजूद

सो एक दश्त मिरा हम-ख़याल हो गया है

ज़रा सी देर को मद्धम हुई चराग़ की लौ

फिर उस के बा'द का मंज़र मुझे नहीं मा'लूम

कुछ पेड़ बहुत देर से ख़ामोश खड़े हैं

बस्ती में मुसाफ़िर मकाँ कुछ भी नहीं है

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