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मुख़तार तलहरी के शेर
मुख़तार तलहरीदिल दुखाना मिरा नहीं मक़्सद
हक़-बयानी मिरी नहीं जाती
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मुख़तार तलहरीइक तो वैसे ही उदासी की घटा छाई है
और छेड़ोगे तो आँसू भी निकल सकते हैं
मुख़तार तलहरीआप मज़लूम के अश्कों से न खिलवाड़ करें
ये वो दरिया हैं जो शहरों को निगल सकते हैं
मुख़तार तलहरीरौशनी के लिए 'मुख़्तार' जलाए थे चराग़
क्या ख़बर थी कि मिरे हाथ भी जल सकते हैं
मुख़तार तलहरीआज ऐसी वादियों से हो के आया हूँ जहाँ
पेड़ थे नज़दीक लेकिन दूर तक साया न था
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मुख़तार तलहरीथका दिया है मुझे इस क़दर मसाफ़त ने
सफ़र के नाम से अब रूह काँप जाती है
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मुख़तार तलहरीशिद्दत-ए-प्यास के एहसास को बढ़ने दीजे
एड़ियों से कभी चश्मे भी उबल सकते हैं
मुख़तार तलहरीजिस वक़्त हुआ करती है बेचैन तबीअत
उस वक़्त बयाबान से लगते हैं चमन भी
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मुख़तार तलहरीरहा न काम उस की जुस्तुजू में
इधर मैं ख़ुद से भी गुम हो गया हूँ
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मुख़तार तलहरीहमारे ज़ह्न पे उस का असर तो अब भी है
बिछड़ने वाला शरीक-ए-सफ़र तो अब भी है
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मुख़तार तलहरीमिरी हँसी को सर-ए-बज़्म सह लिया उस ने
फिर उस के बा'द अकेले में इंतिक़ाम लिया
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मुख़तार तलहरीहमारी सम्त से बे-रग़बती न कर वर्ना
तिरे बग़ैर क़रार आ गया तो क्या होगा
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मुख़तार तलहरीमिटाना चाहूँ तो मुमकिन कहाँ मिटा भी सकूँ
वो एक बाल जो आईना-ए-ख़याल में है
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मुख़तार तलहरीइरादे फिर भी मुस्तहकम बहुत हैं
मिरी राहों में पेच-ओ-ख़म बहुत हैं
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मुख़तार तलहरीवो आएँ हम से दलील माँगें
जो कह रहे हैं ख़ुदा नहीं है
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मुख़तार तलहरीउन से बातें करते करते दिल में टीस चमक उट्ठी थी
लफ़्ज़ों पर फूलों की रिदा थी मा'नी में नश्तर पिन्हाँ थे
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