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मुशताक़ अहमद का परिचय
पहचान: आलोचक, शोधकर्ता, स्तंभकार, कवि और शोध पत्रिका ‘जहान-ए-उर्दू’ के संपादक
डॉ. मुश्ताक अहमद का जन्म 21 नवंबर 1967 को बिहार के मधुबनी ज़िले के सकरी कस्बे में हुआ। उनका संबंध एक ऐसे परिवार से है जहाँ कृषि और शिक्षण, दोनों की परंपरा रही है। उनके पिता अब्दुल हकीम साहब रेलवे विभाग के एक विद्यालय में शिक्षक थे, जबकि परिवार के अन्य सदस्य भी शिक्षण कार्य से जुड़े रहे। इसी शैक्षिक वातावरण ने उनके भीतर अध्ययन और शोध का गहरा रुचि विकसित की।
डॉ. मुश्ताक अहमद की प्रारंभिक शिक्षा घर पर धार्मिक अध्ययन से शुरू हुई। बाद में उन्होंने सकरी के मकतब और स्थानीय शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने एस.के. हाई स्कूल, पंडौल (मधुबनी) से स्कूली शिक्षा प्राप्त की, आर.एन. कॉलेज से स्नातक किया तथा दिल्ली से मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की। उर्दू भाषा और साहित्य से गहरे लगाव के कारण उन्होंने उर्दू में एम.ए., पीएच.डी., नेट और जेआरएफ की उपाधियाँ प्राप्त कीं।
1996 में उनकी नियुक्ति एच.एस. कॉलेज, मधेपुरा में उर्दू व्याख्याता के रूप में हुई। अध्यापन के साथ-साथ उन्होंने शोध, आलोचना और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया। बाद में वे मिल्लत कॉलेज, दरभंगा के प्राचार्य बने और विभिन्न महाविद्यालयों में प्राचार्य के रूप में सेवाएँ देने के बाद मिथिला विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार भी रहे। वर्तमान में वे सी.एम. कॉलेज, दरभंगा के प्राचार्य के रूप में शैक्षिक एवं प्रशासनिक दायित्व निभा रहे हैं।
डॉ. मुश्ताक अहमद उर्दू शोध और आलोचना के महत्वपूर्ण नामों में गिने जाते हैं। उनकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और उनका शोध एवं लेखन कार्य निरंतर जारी है। उनकी प्रमुख कृतियों में “तनक़ीदी बसीरत”, “तनक़ीद के तक़ाज़े”, “मसनवी दर-ए-शहवार मा' तनक़ीदी मुताला”, “इक़बाल की अस्री मअनवियत”, “बिहार में उर्दू तहक़ीक़ व तनक़ीद”, “आईना हैरान है” और “ज़र्द मौसम की नज़्में” शामिल हैं।
पत्रकारिता और स्तंभ लेखन से भी उनका गहरा संबंध रहा है। 1980 के दशक से उनके लेख और स्तंभ विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। उनके स्तंभ-संग्रह “जहान-ए-फ़िक्र”, “चराग़-ए-फ़िक्र” और “ऐवान-ए-फ़िक्र” के नाम से प्रकाशित हो चुके हैं। वर्ष 2001 से वे शोध पत्रिका “जहान-ए-उर्दू” का संपादन भी कर रहे हैं, जिसे उर्दू शोध के महत्वपूर्ण जर्नलों में गिना जाता है।
उन्हें कविता से भी विशेष लगाव रहा है। छात्र जीवन से ही वे शायरी करते रहे और अपने कलाम की इस्लाह उस्ताद फ़तह मोहम्मद मेहर शकरी तथा अबुल कैस क़ैसर से लेते रहे। उनकी कविता में वैचारिक संवेदनशीलता, सामाजिक चेतना और समकालीन समस्याओं की गूंज स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
शिक्षा, शोध, पत्रकारिता और सामाजिक सुधार के क्षेत्रों में उनकी सेवाओं के कारण उन्हें साहित्यिक और शैक्षिक जगत में विशेष सम्मान प्राप्त है।
सहायक लिंक : | http://www.drmushtaqueahmad.in/
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