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शमीम हनफ़ी के शेर
शमीम हनफ़ीमैं ने चाहा था कि लफ़्ज़ों में छुपा लूँ ख़ुद को
ख़ामुशी लफ़्ज़ की दीवार गिरा देती है
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शमीम हनफ़ीशाम ने बर्फ़ पहन रक्खी थी रौशनियाँ भी ठंडी थीं
मैं इस ठंडक से घबरा कर अपनी आग में जलने लगा
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शमीम हनफ़ीबंद कर ले खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर न देख
डूबती आँखों से अपने शहर का मंज़र न देख
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शमीम हनफ़ीतमाम उम्र नए लफ़्ज़ की तलाश रही
किताब-ए-दर्द का मज़मूँ था पाएमाल ऐसा
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शमीम हनफ़ीवो एक शोर सा ज़िंदाँ में रात भर क्या था
मुझे ख़ुद अपने बदन में किसी का डर क्या था
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शमीम हनफ़ीबुलंदियाँ आसमाँ की सूरत ज़मीन के पाँव चूमती हैं
ज़मीन शायद बुलंद-तर थी ज़मीन ही में उतर गया वो
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