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शमीम हनफ़ी के लेख
ग़ालिब की उर्दू नस्र
उर्दू गद्य और पद्य (नस्र और नज़्म) के इतिहास में ग़ालिब कई लिहाज़ से एक विशेष हैसियत रखते हैं। इस विशेषता का एक पहलू यह भी है कि किसी दूसरे लेखक ने इतना कम लिखकर अपने लिए ऐसी मज़बूत और स्थायी जगह नहीं बनाई जैसी कि ग़ालिब ने। मीर ग़ुलाम हसनैन क़दर बिलग्रामी
मीर और ग़ालिब
मीर और ग़ालिब का नाम एक साथ ज़ेहन में जो आता है तो सिर्फ़ इसलिए नहीं कि दोनों ने अपनी अभिव्यक्ति के लिए शायरी की एक ही विधा को अहमियत दी या यह कि दोनों का संबंध साहित्य और तहज़ीब की उस परंपरा से था जो ज़माने के फ़र्क़ के साथ हमारे सामूहिक जीवन के एक
मीराजी और नई शाइरी की बुनियादें
"जी चाहता है कि बाज़ारी गवैया बनकर गली-गली, बस्ती-बस्ती घूमता फिरूँ। यूँ ही ज़िंदगी गुज़ार दूँ। एक औरत और एक हारमोनियम की पेटी पहलू में लिए और दुनिया यह समझे कि वह हमारा तमाशा देखकर रहम खाती है और मैं यह समझूँ कि तमाशाई हूँ। यह हारमोनियम की पेटी, यह
अवामी अदब के मसायल और उर्दू की अदबी रिवायत
अदब की अ’वामी सिन्फ़ें और रवायतें उर्दू मुआ’शरे में अपने लिए कोई मुस्तक़िल जगह क्यों नहीं बना सकीं? इस सवाल का जवाब बहुत वाज़ेह है और उतना ही अफ़सोस-नाक भी। उर्दू की अशराफ़ियत (Sophistication) और मदनियत (Urbanity) ने बर्र-ए-सग़ीर के मजमूई’’ कल्चर में जिन
अदब में इंसान दोस्ती का तसव्वुर एक सियाह हाशिए के साथ
बीसवीं सदी तारीख़ की सबसे ज़ियादा पुर-तशद्दुद सदी थी। इक्कीसवीं सदी के शानों पर इसी रिवायत का बोझ है। जिस्मानी तशद्दुद से क़त’-ए-नज़र, बीसवीं सदी ने इंसान को तशद्दुद के नित-नए रास्तों पर लगा दिया। तहज़ीबी, लिसानी, सियासी, जज़्बाती तशद्दुद के कैसे-कैसे
मंटो और फ़ह्हाशी
मंटो एक घटना का शीर्षक है। हमारे कथा-साहित्य के इतिहास की शायद सबसे अहम, सार्थक और मुकम्मल घटना का। इस घटना की शुरुआत उनकी पहली कहानी के साथ हुई थी। अब अगर आप किसी साहित्यिक इतिहासकार से पूछें तो वह बताएगा कि इस घटना का अंतिम बिंदु 1955 के जनवरी महीने
नस्री नज़्म का मसअला
एक सवाल, जिस पर ग़ौर करने की ज़रूरत हमेशा बाक़ी रहेगी, यह है कि साहित्य की विधाओं (सिन्फ़ों) के ढांचे या शिल्प (हैयत) को तय करने में बुनियादी रोल कौन अदा करता है? या यह कि किसी ख़ास विधा की बनावट के तत्वों में सबसे ज़्यादा दख़ल किसका होता है? शेरी और
तक़सीम का अदब और तशद्दुद की शेरियात
विभाजन का साहित्य और हिंसा की शाइरियात देवियो और सज्जनो! आज की बातचीत का विषय है विभाजन का साहित्य और उससे तैयार होने वाली शाइरियात, जिसकी पहचान सांप्रदायिक हिंसा के अनुभव से जुड़ी है। हिंसा हमारे ज़माने की सबसे हावी शैली है। बीसवीं सदी को मानव इतिहास
मीराजी और नई शेरी रिवायत
इक्का-दुक्का कविताओं की रोशनी में आधुनिकता के शुरुआती निशान तलाश किए जाएं तो तसद्दुक़ हुसैन ख़ालिद, तासीर, फ़िराक़, शाद आरफ़ी, मजाज़, जज़्बी, जां निसार अख़्तर, साहिर, कैफ़ी, सलाम मछली शहरी, यहाँ तक कि बीसवीं सदी की शुरुआत के कुछ कवियों के यहाँ भी नई
मंटो और नया अफ़साना
उर्दू अफ़साने के इतिहास में मंटो की जगह इतनी सुरक्षित और हमारे फ़िक्शन की परंपरा में उनका मर्तबा इतना मज़बूत है कि अब मंटो के बारे में सिर्फ़ तारीफ़ और श्रद्धा जताने का कोई मतलब नहीं निकलता। अपनी हैसियत ख़ुद मंटो ने जिस तरह तय की थी, अपनी अलग-अलग रचनाओं,
अकबर की मानविय्यत
फ़िराक़ साहब ने अकबर को एशिया के बड़े शा’इरों में शुमार किया है। बहुतों को ये राय मुबालग़ा-आमेज़ महसूस होगी कि एशिया क्या, उर्दू के बड़े शा’इरों में भी अकबर का नाम आ’म तौर पर नहीं लिया जाता। अकबर को शाइ’र की हैसियत से, बहर-हाल जो भी जगह दी जाए कम से कम इस
मियाँ नज़ीर
मियाँ नज़ीर शायद उर्दू के तन्हा शाइ’र हैं जिन्होंने किसी मसअले से सरोकार नहीं रखा, सो पढ़ने वाले के लिए भी मसअला न बन सके। एक मुद्दत तक उनके तईं जो बे-नियाज़ी आ’म रही, उसका बुनियादी सबब यही है कि उन्होंने अपने पढ़ने या सुनने वालों से कभी कोई ऐसा मुतालिबा
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