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शमीम हनफ़ी
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ड्रामा 4
अशआर 6
मैं ने चाहा था कि लफ़्ज़ों में छुपा लूँ ख़ुद को
ख़ामुशी लफ़्ज़ की दीवार गिरा देती है
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शाम ने बर्फ़ पहन रक्खी थी रौशनियाँ भी ठंडी थीं
मैं इस ठंडक से घबरा कर अपनी आग में जलने लगा
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बंद कर ले खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर न देख
डूबती आँखों से अपने शहर का मंज़र न देख
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तमाम उम्र नए लफ़्ज़ की तलाश रही
किताब-ए-दर्द का मज़मूँ था पाएमाल ऐसा
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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
Professor Shamim Hanfi was born on 17th May 1939 in Sultanpur, Uttar Pradesh to a renowned advocate Mohd. Yaseen Siddiqui. Early life was spent in Sultanpur but had to move to Allahabad for study purpose where he came in contact with Firaq Sb who left a profound impression upon him. He had served as a faculty for Aligarh Muslim University before Joining Jamia Millia Islamia. He is now Professor Emeritus at the same University. He is reciting his Ghazal at Rekhta Studio. शमीम हनफ़ी
ऑडियो 20
अब क़ैस है कोई न कोई आबला-पा है
आना उसी का बज़्म से जाना उसी का है
इस तरह इश्क़ में बर्बाद नहीं रह सकते
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