aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
पहचान: कथाकार, शाइर, आलोचक और उर्दू के बहुआयामी साहित्यकार
ग़ज़नफ़र का जन्म 9 मार्च 1953 को बिहार के गोपालगंज ज़िले के गाँव चौरांव में एक ग्रामीण परिवार में हुआ। उनकी माता का नाम दरूदन खातून और पिता का नाम अब्दुल मजीब था।
मुस्लिम परंपरा के अनुसार उनकी शिक्षा की शुरुआत मदरसे से हुई। उसके बाद उन्होंने कुतुब छपरा (ज़िला सिवान) के अपर प्राइमरी मकतब से पाँचवीं, सिमरा मिडिल स्कूल से मिडिल और वी.एम.एम.एच.ई. स्कूल, गोपालगंज से हायर सेकेंडरी की शिक्षा प्राप्त की। आगे चलकर उन्होंने गोपालगंज कॉलेज से बी.ए. किया।
उन्होंने बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ्फरपुर में एम.ए. उर्दू में प्रवेश लिया, किंतु बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय चले गए, जहाँ से 1976 में उर्दू में एम.ए. विशिष्ट योग्यता (Distinction) के साथ उत्तीर्ण किया। 1982 में “शिब्ली नोमानी के आलोचनात्मक सिद्धांत” विषय पर शोध प्रबंध लिखकर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
प्रोफेसर ग़ज़नफ़र ने देश के अनेक महत्वपूर्ण भाषायी और शैक्षिक संस्थानों में उच्च सेवाएँ प्रदान कीं। वे ए.एम.यू. में अस्थायी व्याख्याता, उर्दू-ए-मुअल्ला के वरिष्ठ सचिव तथा अलीगढ़ मैगज़ीन के संपादकीय मंडल के सदस्य रहे।
यूपीएससी के माध्यम से उनका चयन उर्दू टीचिंग एंड रिसर्च सेंटर, सोलन (हिमाचल प्रदेश) में व्याख्याता-कम-जे.आर.ओ. के रूप में हुआ, जहाँ उन्होंने लगभग 11–12 वर्षों तक सेवाएँ दीं। बाद में वे लखनऊ केंद्र के प्राचार्य बने।
सेवा काल के दौरान वे तीन वर्षों तक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में रीडर भी रहे। इसके अतिरिक्त उन्होंने सिंधी अकादमी, वडोदरा के निदेशक तथा रीजनल लैंग्वेजेज़, पटियाला (पंजाब) के प्रभारी के रूप में भी कार्य किया।
2008 में उनकी नियुक्ति जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली की अकादमी फ़ॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू टीचर्स में प्रोफेसर एवं निदेशक के रूप में हुई। दस वर्षों की सेवा के बाद 2018 में वे सेवानिवृत्त हुए। वे Urdu Style Manual के संपादक रहे तथा जामिया से तदरीस नामा नामक एक विशिष्ट शैक्षिक पत्रिका भी प्रकाशित की।
ग़ज़नफ़र समकालीन उर्दू कथा-साहित्य के प्रमुख रचनाकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना, रेखाचित्र, मसनवी, नाटक तथा भाषा-शिक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है।
उनके उपन्यासों में पानी, केंचली, कहानी अंकल, दिव्य वाणी, फ़ुसूँ, विष मंथन, मिम, शोराब और माँझी शामिल हैं। पानी (1989) को उर्दू के महत्वपूर्ण उपन्यासों में गिना जाता है, जिसमें जल के एकाधिकार और मानवीय संघर्ष को प्रभावशाली प्रतीकात्मकता के साथ प्रस्तुत किया गया है।
उनकी अन्य प्रमुख कृतियों में हैरत फ़रोश, पार्किंग एरिया, आँख में लुकनत, सुख़न ग़ुंचा, सुरख़ रू, रू-ए-ख़ुशरंग, फ़िक्शन से अलग तथा मशरिक़ी मेयार-ए-नक़्द शामिल हैं, जबकि 'देख ली दुनिया हमने' उनकी आत्मकथा है।
उर्दू साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।