aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
ضخیم ناول کی اس کتاب کے کردار فرضی ہیں مگر پڑھنے کے بعد اندازہ ہوتا ہے کہ یہ کسی نہ کسی زندگی کو افسانوی شکل میں ڈھالا گیا ہے۔ لفظی میناکاری کے بجائے تمہید کا آغاز اس طرح کردیا گیا ہے کہ پڑھنے والا اچانک سنجیدہ ہوجاتا ہے اور کسی تحیر آمیز منظر کے پیش آنے کا منتظر ہوجاتا ہے۔ کسی منظر میں کردار کو مزاحیہ تو کہیں پر انتہائی سنجیدہ اور گمبھیر بنا کربتایا گیا ہے ۔ کبھی کبھی قاری پڑھنے میں اتنا ڈوب جاتا ہے کہ وہ خود اپنے کو کردار کا ایک حصہ سمجھنے لگتا ہے۔ کہانی کا انجام غیر متوقع اور تحیر آمیز ہے ، پوری کتاب پڑھتے ہوئے کبھی اندازہ نہیں لگایا جاسکتا ہے کہ کہانی نے کب اچانک حیرت انگیز موڑ لے لیا۔ یہ کتاب نہ صرف کہانی بیان کرتی ہے بلکہ پڑھنے والے کو زمانے کے نشیب و فراز اور محبت کی اہمیت سے بھی واقف کراتی ہے۔
पहचान: विशिष्ट उपन्यासकार, शैलीगत कहानीकार, ऐतिहासिक फिक्शन के निर्माता और अवध की संस्कृति के महान कथाकार।
क़ाज़ी अब्दुल सत्तार का जन्म 9 फरवरी 1933 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के मछरेहटा कस्बे में एक प्रतिष्ठित ज़मींदार परिवार में हुआ था। उर्दू साहित्य में उनकी पहचान एक अनूठी शैली के उपन्यासकार और ऐतिहासिक कथा-साहित्य के महत्वपूर्ण लेखक के रूप में है। उन्होंने इतिहास, संस्कृति और भाषा की कोमलता को इस तकनीकी कौशल के साथ पिरोया कि वे उर्दू के सबसे प्रभावशाली फिक्शन लेखकों में शामिल हो गए।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सीतापुर से प्राप्त की। लखनऊ विश्वविद्यालय से 1952 में बी.ए. (ऑनर्स) और 1954 में एम.ए. में प्रथम स्थान प्राप्त किया। लखनऊ की सांस्कृतिक और साहित्यिक फिज़ा ने उनके बौद्धिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से जुड़े, जहाँ प्रोफेसर रशीद अहमद सिद्दीकी के मार्गदर्शन में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने AMU के उर्दू विभाग में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष के रूप में लंबी सेवाएँ दीं और 1993 में सेवानिवृत्त हुए।
उनके लेखन की शुरुआत शोध और आलोचनात्मक कार्यों से हुई। उनकी प्रमुख वैज्ञानिक कृतियों में "उर्दू शायरी में क़नूतियत" और "जमालियात और हिंदुस्तानी जमालियात" शामिल हैं। यद्यपि उन्होंने शुरुआत में क्रांतिकारी कविताएँ भी लिखीं, लेकिन बाद में गद्य (Prose) को ही अपना मुख्य माध्यम बनाया।
ज़मींदारी परिवेश में पले-बढ़े होने के कारण उनकी रचनाओं में उस व्यवस्था के पतन, सांस्कृतिक ह्रास और अतीत की महिमा का गहरा अहसास मिलता है। 1964 में प्रकाशित उनकी कहानी "पीतल का घंटा" ने उन्हें विश्वव्यापी प्रसिद्धि दिलाई, जो अवध की गिरती संस्कृति का एक मार्मिक विलाप है। उनके ऐतिहासिक उपन्यासों—"ख़ालिद बिन वलीद", "सलाहुद्दीन अय्यूबी", "दारा शिकोह" और "ग़ालिब"—में इतिहास इस जीवंतता के साथ उभरता है कि पाठक स्वयं को उस युग का गवाह महसूस करने लगता है।
उन्हें उर्दू गद्य का "शब्दावली का जादूगर" कहा जाता है। उनकी शैली में शालीनता, काव्य लय और मुहावरों का सुंदर प्रयोग मिलता है।
साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हें 1974 में पद्म श्री सहित कई सम्मानों से नवाजा गया।
निधन: 29 अक्टूबर 2018 को दिल्ली में उनका निधन हुआ और अलीगढ़ में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया।