aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
اسماعیل میرٹھی کی بچوں کے ادب میں عظیم خدمات ہیں۔ انہوں نے جس یکجہتی سے بچوں کی نفسیات کا مطالعہ کر کے ان کے لیے لکھا وہ کسی اور کے حصہ میں نہیں آیا ۔ ان کی اکثر تحریروں کا مقصد اصلا ح قوم ہے اس کے لیے انہوں نے تمثیلات کابھی سہارا لیا اور ان کے کردا رو عمل کی آڑ میں بچوں کومحنت ، عمدہ اخلاق ، قوت عمل اور جہد مسلسل کی تلقین کی اسی لیے ان کی تحریریں بچوں کے لیے عمدہ اخلاق کی ضامن ہوتی ہیں ۔ اگر چہ ان کی خدمات تمام اصناف ادب میں نظرآتی ہے لیکن اردو ادب میں ناقدین نے ان کو پچوں تک ہی محدود کر رکھاہے اس لیے ان کے حوالے سے بچوں کی ہی تحریر یں سامنے آتی ہیں۔انہوں نے بچوں کے لیے ابتدائی درجات سے ثانوی درجات تک کے لیے کتابیں لکھی ہیں ،اس میں کہانیاں ہیں اور نظمیں بھی ۔یہ ان کی اردو اور فارسی زبان پر مشتمل کلیات ہے جس میں بچوں کے لیے چونسٹھ نظمیں ہیں ۔ انہوں نے تقر یبا ہر صنف شاعر ی میں اپنی شاعری کے جوہر دکھائے ہیں جس کا انداز ہ اس کلیات کے مطالعہ سے ہوتا ہے ، مثلث اور اس کی ہم شکل قسمیں ،قصائد ، رباعیات ، غزلیا ت ، ابیات اور ترجیع بند بھی ہے ۔ فارسی کے کلام میں بھی تقریبا یہی تمام اصناف موجود ہیں ۔ ان کی چنندہ نظموں سے مسلسل فائدہ اٹھایا جاتا ہے لیکن مکمل شاعری سے فائدہ اٹھانے کے لیے یہ کلیات آپ کے سامنے ہے ۔
पहचान: आधुनिक उर्दू नज़्म के निर्माताओं में शामिल, प्रख्यात शिक्षाविद् और बाल-साहित्यकार
मौलवी इस्माइल मेरठी 12 नवंबर 1844 को मेरठ (उत्तर प्रदेश) के 'मशाइख़ान' (वर्तमान में इस्माइल नगर) मोहल्ले में पैदा हुए। उनके पिता का नाम शेख पीर बख़्श था। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा घर पर प्राप्त की और फ़ारसी की उच्च शिक्षा मिर्ज़ा रहीम बेग से पाई। इसके बाद उन्होंने मेरठ के नॉर्मल स्कूल (टीचर्स ट्रेनिंग स्कूल) से शिक्षण की सनद हासिल की। अपनी शिक्षा के दौरान उन्हें रेखागणित (ज्यामिति), भौतिक विज्ञान और खगोल विज्ञान में विशेष रुचि रही। रुड़की कॉलेज में ओवरसीयर का कोर्स अधूरा छोड़कर उन्होंने शिक्षा विभाग में नौकरी कर ली। 1867 में वे सहारनपुर में फ़ारसी के शिक्षक नियुक्त हुए और 1888 में आगरा के सेंट्रल नॉर्मल स्कूल से जुड़े, जहाँ से 1899 में सेवानिवृत्त (रिटायर) होकर मेरठ वापस आ गए।
मौलवी इस्माइल मेरठी की गिनती उर्दू कविता के शुरुआती निर्माताओं और आधुनिक कविता की नीव रखने वालों में होती है। 1857 के बाद के दौर में जब सर सैयद आंदोलन ने मानसिक और वैचारिक चेतना का माहौल पैदा किया, तो उन्होंने साहित्य को शिक्षा और चरित्र-निर्माण का एक प्रभावी माध्यम बनाया। उर्दू के कायदों और प्रारंभिक पाठ्यपुस्तकों के निर्माण में उनकी सेवाएँ बुनियादी महत्व रखती हैं। हालांकि वे बच्चों के साहित्य के लिए अधिक प्रसिद्ध हैं, लेकिन उनका साहित्यिक व्यक्तित्व इससे कहीं अधिक व्यापक और बहुमुखी है।
उन्होंने ग़ज़ल, क़सीदा, मसनवी, रुबाई और नज़्म के विभिन्न रूपों में लेखन किया। उन्होंने मुसल्लस, मुरब्बा, मुख़म्मस और मुसम्मन जैसी विधाओं में सफल प्रयोग किए और 'नज़्म-ए-मुअर्रा' (Blank Verse) की राहें साफ़ कीं। उनकी कविता में प्रकृति-चित्रण, नैतिक शिक्षा, राष्ट्रीय चेतना, मानवीय सहानुभूति और व्यावहारिक जीवन की सच्चाइयाँ प्रमुखता से दिखाई देती हैं।
उनकी कविताओं का पहला संग्रह "रेज़ा-ए-जवाहर" 1885 में प्रकाशित हुआ, जिसमें कुछ अंग्रेज़ी कविताओं के काव्यात्मक अनुवाद भी शामिल थे। उन्होंने फ़ारसी रीडर्स तैयार कीं, भूगोल (ज्यामिति) पर पुस्तक लिखी और "तज़किरा-ए-ग़ौसिया" जैसी यादगार रचना भी छोड़ी। 1909 में उन्होंने मेरठ में "मदरसा-तुल-बनात" की स्थापना की, जो आज "इस्माइलिया डिग्री Girls कॉलेज" के नाम से जाना जाता है। वे मेरठ मुस्लिम लीग के उपाध्यक्ष और 'अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू' की सलाहकार परिषद के सदस्य भी रहे। उनकी शैक्षणिक और साहित्यिक सेवाओं के सम्मान में तत्कालीन सरकार ने उन्हें "ख़ान साहब" की उपाधि से नवाज़ा था।
निधन: मौलवी इस्माइल मेरठी का निधन 1 नवंबर 1917 को मेरठ में हुआ।