आदमी भी आदमी का राज़दाँ होता नहीं

ख़ालिद हसन क़ादिरी

आदमी भी आदमी का राज़दाँ होता नहीं

ख़ालिद हसन क़ादिरी

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    आदमी भी आदमी का राज़दाँ होता नहीं

    बे ख़बर रहता है लेकिन बद-गुमाँ होता नहीं

    ज़हमतें यकसाँ मकान-ओ-ला-मकाँ से क्या हुआ

    क्या ख़लाओं से परे भी आसमाँ होता नहीं

    हम कि ख़ुद रह-रव भी हैं रहबर भी हैं रहज़न भी हैं

    वाँ पहुँचते हैं जहाँ पर कारवाँ होता नहीं

    बढ़ गए इख़्वान-ए-यूसुफ़ से ये इख़्वानुस्सफ़ा

    फेंक देते हैं वहाँ जिस जा कुआँ होता नहीं

    है जराहत-आफ़रीं दरमान-ए-दर्द-ए-ला-दवा

    शो'ला करता है शरर-बारी धुआँ होता नहीं

    हुस्न-ए-बे-पर्दा हरीफ़-ए-ताब-ए-नज़्ज़ारा नहीं

    हो नज़र के सामने लेकिन अयाँ होता नहीं

    मर्ग-ए-बे-हंगाम अपने शहर का मामूल है

    लोग मर जाते हैं कोई नौहा-ख़्वाँ होता नहीं

    जो भी हो जिस हाल में है ज़िंदगी उस को अज़ीज़

    जान-ए-जाँ कहने से कुछ जान-ए-जहाँ होता नहीं

    बे-अदा-कारी भी ख़ामोशी से मर जाते हैं लोग

    याँ पे कोई खेल मिर्ज़ा साहेबाँ होता नहीं

    स्रोत :
    • पुस्तक : Sada-e-sher-e-fusu.n (पृष्ठ 69)
    • रचनाकार : Khalid Hassan Qadrii
    • प्रकाशन : Asif Javed (2001)
    • संस्करण : 2001

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