मैं सर छुपाऊँ कहाँ साया-ए-नज़र के बग़ैर

सलीम अहमद

मैं सर छुपाऊँ कहाँ साया-ए-नज़र के बग़ैर

सलीम अहमद

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    मैं सर छुपाऊँ कहाँ साया-ए-नज़र के बग़ैर

    कि तेरे शहर में रहता हूँ और घर के बग़ैर

    मुझे वो शिद्दत-ए-एहसास दे कि देख सुकूँ

    तुझे क़रीब से और मिन्नत-ए-नज़र के बग़ैर

    ये शहर ज़ेहन से ख़ाली नुमू से आरी है

    बलाएँ फिरती हैं याँ दस्त पा सर के बग़ैर

    निकल गए हैं जो बादल बरसने वाले थे

    ये शहर आब को तरसेगा चश्म-ए-तर के बग़ैर

    कोई नहीं जो पता दे दिलों की हालत का

    कि सारे शहर के अख़बार हैं ख़बर के बग़ैर

    मैं पाँव तोड़ के बैठा रहा कहीं गया

    'सलीम' मंज़िलें तय हो गईं सफ़र के बग़ैर

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