तुझे पा कर भी जब कोई कमी महसूस होती है

ख़ालिद महमूद ज़की

तुझे पा कर भी जब कोई कमी महसूस होती है

ख़ालिद महमूद ज़की

MORE BYख़ालिद महमूद ज़की

    तुझे पा कर भी जब कोई कमी महसूस होती है

    तो फिर ये साँस भी रुकती हुई महसूस होती है

    जो कहना ही नहीं उस का इशारा क्यूँ दिया जाए

    कि ऐसी बात तो कुछ और भी महसूस होती है

    अदीम-उल-फ़ुर्सती शिद्दत से उस का याद जाना

    ग़नीमत है अगर ये तिश्नगी महसूस होती है

    पलट कर गए हो तुम तो क्यूँ आए नहीं लगते

    तुम्हारी आँख में क्यूँ गर्द सी महसूस होती है

    वगर्ना बोझ है जिस को लिए फिरना है काँधे पर

    करें महसूस तो ये ज़िंदगी महसूस होती है

    शजर वो भी जिसे सींचा हो अपना ख़ून दे दे कर

    कभी उस की भी छाँव अजनबी महसूस होती है

    ये मेरे ख़्वाब हैं जो साया करते हैं मिरे सर पर

    मुझे इस दोपहर में छाँव सी महसूस होती है

    किसी की गुफ़्तुगू के दरमियाँ अक्सर जाने क्यूँ

    कहीं गहरी सी कोई ख़ामुशी महसूस होती है

    ज़मीं तेरी तरह मैं भी सफ़र में हूँ कि जैसे तू

    कभी ठहरी नहीं ठहरी हुई महसूस होती है

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY
    बोलिए