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बार-ए-ख़्वाहिश

मुहसिन ख़ालिद मुहसिन

बार-ए-ख़्वाहिश

मुहसिन ख़ालिद मुहसिन

MORE BYमुहसिन ख़ालिद मुहसिन

    इंसान लालच करता है

    ये उस की हड्डियों में रखा हुआ

    एक नर्म सा शो'ला है

    जो मौक़ा' मिलते ही भड़क उठता है

    हमारे अब्बा ने भी

    एक दिन जोश की पेशानी चूम कर

    बार-ए-अमानत सर पर रख लिया था

    सोचा था क़ामत सीधी रहेगी

    मगर बोझ ने

    घुटनों से पहले अना तोड़ दी

    शर्मिंदगी

    इंसान का पहला उस्ताद है

    लालच

    सिर्फ़ ज़र का नहीं होता

    कभी नाम का

    कभी दवाम का

    कभी इस यक़ीन का

    कि मैं ग़लत नहीं हो सकता

    कहते हैं

    क़ाबील ने हुस्न की चाह में

    ख़ून की पहली लकीर खींची

    और हाबील भी

    क़ुबूलिय्यत के ग़ुरूर से ख़ाली था

    इब्राहीम ने ख़ुशनूदी चाही

    और आग को दलील बना दिया

    फ़िर'औन ने ख़ुदाई माँगी

    और दरिया में उतर गया

    नमरूद ने बादशाहत को आसमान तक उछाला

    और एक मा'मूली ज़र्ब सह सका

    क़ारून ने दौलत को दवाम समझा

    और ज़मीन ने उसे अपनी गवाही में दफ़्न कर दिया

    ज़माना बदलता रहता है

    लालच की ता'रीफ़ें बदलती रहती हैं

    मगर मा'नी वही रहते हैं

    मैं ने भी लालच किया

    एक ख़्वाब का

    एक तरतीब का

    एक ऐसी 'औरत का

    जो मेरे बे-तरतीब दिनों को

    क़रीने से रख दे

    मैं ने सोचा था

    वो मेरे घर की दीवारों पर

    सुकून की सफ़ेदी फेर देगी

    और मैं

    अपने वहम की सल्तनत में

    एक शहज़ादे की तरह रहूँगा

    मगर हुस्न

    जब ख़ुद को आईना समझने लगे

    तो सामने खड़ा शख़्स

    महज़ 'अक्स रह जाता है

    वो ज़हीन थी

    और मैं

    मोहब्बत को दलील समझने की ग़लती में मुब्तला

    फिर यूँ हुआ

    कि इल्ज़ाम

    मेरे नाम का दूसरा जुज़्व बन गया

    ज़िल्लत

    मेरी पेशानी का इस्ति'आरा

    और ख़ामोशी

    मेरी वाहिद पनाह

    मैं ने मोहब्बत का दामन नहीं छोड़ा

    क्यूँकि मुझे सिखाया गया था

    कि 'औरत को मु'आफ़ कर देना

    मर्दांगी की मे'राज है

    मगर मु'आफ़ी

    जब यक-तरफ़ा हो

    तो इंसाफ़ यतीम हो जाता है

    मोहब्बत

    दूसरे पर हक़ जताने का नाम नहीं

    मगर हम 'इबादत में भी

    जज़ा के उम्मीद-वार रहते हैं

    ख़्वाहिश और हाकिमिय्यत के दरमियान

    एक बारीक लकीर होती है

    इसे पार करते ही

    मोहब्बत

    मु'आहिदा बन जाती है

    मैं ने चाहा

    कि मेरे जज़्बात की ता'ज़ीम हो

    मेरी बरतरी तस्लीम की जाए

    और रिश्ता

    इता'अत के सुतूनों पर खड़ा हो

    मगर इंसान

    निस्यान का पुतला है

    आज का वा'दा

    कल की याद-दाश्त में नहीं रहता

    मैं तुम से बेहतर पा सकती हूँ

    ये जुमला नहीं

    एक ज़लज़ला है

    जो मर्द के वुजूद में

    सदियों से ता'मीर की गई 'इमारत गिरा देता है

    लालच

    जब अपनी तौजीह ख़ुद घड़ने लगे

    तो ख़्वाहिश नहीं रहता

    जब्र बन जाता है

    और जब्र

    हर रिश्ते का पहला ज़वाल है

    अब मैं लालच से डरता नहीं

    उसे पहचान लेता हूँ

    वो जब दु'आ बने

    तो सर झुका देता हूँ

    और जब ग़ुरूर बने

    तो आँख बंद कर लेता हूँ

    अब मैं ख़्वाहिश से इंकार नहीं करता

    मगर उसे नाम देने से पहले

    अपना ज़र्फ़ देख लेता हूँ

    अस्ल इम्तिहान

    दूसरे को हासिल करना नहीं

    ख़ुद को पहचानना है

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