अबीर अबुज़री के शेर
बहुत दुबली बहुत पतली हयाती होती जाती है
चपाती रफ़्ता रफ़्ता काग़ज़ाती होती जाती है
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मिली है हुक्मरानी देस की जब पारसाओं को
तो अपनी क़ौम क्यूँ फिर वारदाती होती जाती है
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अभी तो तुझे एक फेंटी लगी है
अभी तो तिरे इम्तिहाँ और भी हैं
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