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अबरार आज़मी

1936 - 2020 | आज़मगढ़, भारत

ग़ज़ल 10

शेर 9

कमरे में धुआँ दर्द की पहचान बना था

कल रात कोई फिर मिरा मेहमान बना था

तमाम रात वो पहलू को गर्म करता रहा

किसी की याद का नश्शा शराब जैसा था

परिंदे फ़ज़ाओं में फिर खो गए

धुआँ ही धुआँ आशियानों में था

मुझे भी फ़ुर्सत-ए-नज़्ज़ारा-ए-जमाल थी

और उस को पास किसी और के भी जाना था

आवाज़ों का बोझ उठाए सदियों से

बंजारों की तरह गुज़ारा करता हूँ

पुस्तकें 2

Ghubar Shisha-e-Saat

 

 

Nasr Paare

Nasri Nigarshat Ka Intekhab

2015

 

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