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अख़तर मुस्लिमी

1928 - 1989 | आज़मगढ़, भारत

परम्परा की गहरी चेतना के साथ शायरी करने के लिए प्रसिद्ध

परम्परा की गहरी चेतना के साथ शायरी करने के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 11

शेर 24

एक ही अंजाम है दोस्त हुस्न इश्क़ का

शम्अ भी बुझती है परवानों के जल जाने के ब'अद

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मेरे किरदार में मुज़्मर है तुम्हारा किरदार

देख कर क्यूँ मिरी तस्वीर ख़फ़ा हो तुम लोग

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इक़रार-ए-मोहब्बत तो बड़ी बात है लेकिन

इंकार-ए-मोहब्बत की अदा और ही कुछ है

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इंसाफ़ के पर्दे में ये क्या ज़ुल्म है यारो

देते हो सज़ा और ख़ता और ही कुछ है

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हाँ ये भी तरीक़ा अच्छा है तुम ख़्वाब में मिलते हो मुझ से

आते भी नहीं ग़म-ख़ाने तक वादा भी वफ़ा हो जाता है

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पुस्तकें 4

कुल्लियात-ए-अख़तर मुसलिमी

 

2013

Kullyat-e-Akhtar Muslimi

 

2017

Mauj-e-Nasim

 

1961

Mauj-e-Saba

 

1981

 

चित्र शायरी 1

तुम्हारी बज़्म की यूँ आबरू बढ़ा के चले पिए बग़ैर ही हम पाँव लड़खड़ा के चले

 

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