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मुख़तसर आज़मी

1939 - 2009 | आज़मगढ़, भारत

मुख़तसर आज़मी

नज़्म 1

 

अशआर 4

बेटे में चाहे लाख ख़राबी हो 'मुख़्तसर'

शादी के वक़्त बाइ'स-ए-इन्कम ज़रूर है

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बी-ए में पढ़ रहा है ये नॉलिज का हाल है

नक़्शे में लखनऊ को कहे कानपूर है

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मैं रो रहा हूँ ये तो जहाँ से चला गया

अपनी बला को मेरे गले से लगा गया

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करो हिन्द में बात इत्तिहाद-ए-मिल्लत की

कि इस से होते हैं अमरीकियों के कान खड़े

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हास्य 7

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