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अबु मोहम्मद सहर

1930 - 2002 | भोपाल, भारत

प्रसिद्ध आलोचक और शायर, साहित्यिक आलोचना व शोध से सम्बंधित कई महत्वपूर्ण पुस्तकें यादगार छोड़ीं

प्रसिद्ध आलोचक और शायर, साहित्यिक आलोचना व शोध से सम्बंधित कई महत्वपूर्ण पुस्तकें यादगार छोड़ीं

ग़ज़ल 19

शेर 14

तकमील-ए-आरज़ू से भी होता है ग़म कभी

ऐसी दुआ माँग जिसे बद-दुआ कहें

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इश्क़ के मज़मूँ थे जिन में वो रिसाले क्या हुए

किताब-ए-ज़िंदगी तेरे हवाले क्या हुए

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हिन्दू से पूछिए मुसलमाँ से पूछिए

इंसानियत का ग़म किसी इंसाँ से पूछिए

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पुस्तकें 26

अदबी तहक़ीक़-ओ-तन्क़ीद

 

2002

Barg-e-Ghazal

 

1981

बर्ग-ए-सहर

 

2002

Ghalibiyat Aur Ham

 

1994

Ghalibiyat Ke Chand Mabahis

 

1973

Hindi-Hindawi Par Ek Nazar Aur Dusre Mazameen

 

1999

Intikhab Qasaid-e-Urdu

 

1975

इंतिख़ाब क़साइद-ए-उर्दू

 

1969

Intikhab-e-Qasaid-e-Urdu

 

2012

Intikhab-e-Qasaid-e-Urdu

 

1995

चित्र शायरी 3

होश-मंदी से जहाँ बात न बनती हो 'सहर' काम ऐसे में बहुत बे-ख़बरी आती है

अब तक इलाज-ए-रंजिश-ए-बे-जा न कर सके इक उम्र में भी हुस्न को अपना न कर सके थी एक रस्म-ए-इश्क़ सो हम ने भी की अदा दुनिया में कोई काम अनोखा न कर सके कल रात दिल के साथ बुझे इस तरह चराग़ यादों के सिलसिले भी उजाला न कर सके अब इस से क्या ग़रज़ है कि अंजाम क्या हुआ ये तो नहीं कि तेरी तमन्ना न कर सके ख़ुद इश्क़ ही को दे गए रुस्वाइयों के दाग़ वो राज़-ए-हुस्न हम जिन्हें इफ़शा न कर सके ज़ौक़-ए-जुनूँ को रास नहीं तंग बस्तियाँ सहरा न हो तो क्या कोई दीवाना कर सके हर इम्तियाज़ उस के लिए हेच है 'सहर' जो अपनी ज़िंदगी को तमाशा न कर सके

हमें तन्हाइयों में यूँ तो क्या क्या याद आता है मगर सच पूछिए तो एक चेहरा याद आता है

 

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