ऐन इरफ़ान

ग़ज़ल 14

अशआर 13

बे-मक़्सद महफ़िल से बेहतर तन्हाई

बे-मतलब बातों से अच्छी ख़ामोशी

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बहुत नज़दीक थे तस्वीर में हम

मगर वो फ़ासला जो दिख रहा था

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बस एक धुन थी समुंदर को पार करने की

मैं जानता था समुंदर के पार कुछ भी था

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जहाँ तक डूबने का डर है तुम को

चलो हम साथ चलते हैं वहाँ तक

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गामज़न हैं हम मुसलसल अजनबी मंज़िल की सम्त

ज़िंदगी की आरज़ू में ज़िंदगी खोते हुए

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"मुजफ्फरनगर" के और शायर

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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