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अलीम अख़्तर

1914 - 1972 | मेरठ, भारत

पूर्वाधुनिक शायर, क्लासिकी रंग में ग़ज़लें कहीं. मासिक ‘शमा’ से सम्बद्ध रहे, बच्चों के लिए लिखी गई नज़्मों का एक संग्रह भी प्रकाशित हुआ

पूर्वाधुनिक शायर, क्लासिकी रंग में ग़ज़लें कहीं. मासिक ‘शमा’ से सम्बद्ध रहे, बच्चों के लिए लिखी गई नज़्मों का एक संग्रह भी प्रकाशित हुआ

ग़ज़ल 9

नज़्म 1

 

शेर 10

दर्द बढ़ कर दवा हो जाए

ज़िंदगी बे-मज़ा हो जाए

ये और बात कि इक़रार कर सकें कभी

मिरी वफ़ा का मगर उन को ए'तिबार तो है

मेरी बेताबियों से घबरा कर

कोई मुझ से ख़फ़ा हो जाए

पुस्तकें 2

निकहत-ए-गुल

 

1957

फूल पत्ते

 

1958

 

ऑडियो 9

किसी के वादा-ए-फ़र्दा पर ए'तिबार तो है

तू अगर दिल-नवाज़ हो जाए

दर्द बढ़ कर दवा न हो जाए

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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