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अली ज़हीर रिज़वी लखनवी

1931 - 1982 | लखनऊ, भारत

हमारी ज़िंदगी क्या है मोहब्बत ही मोहब्बत है

तुम्हारा भी यही दस्तूर बन जाए तो अच्छा हो

नफ़रत से मोहब्बत को सहारे भी मिले हैं

तूफ़ान के दामन में किनारे भी मिले हैं

ज़रा पर्दा हटा दो सामने से बिजलियाँ चमकें

मिरा दिल जल्वा-गाह-ए-तूर बन जाए तो अच्छा हो

राज़-ए-ग़म-ए-उल्फ़त को ये दुनिया समझ ले

आँसू मिरे दामन में तुम्हारे भी मिले हैं

मिरा ख़ून-ए-जिगर पुर-नूर बन जाए तो अच्छा हो

तुम्हारी माँग का सिन्दूर बन जाने तो अच्छा हो

वो तो था आदमी की तरह 'ज़हीर'

उस का चेहरा फ़रिश्तों जैसा था

कान सुनते तो हैं लेकिन समझने के लिए

कोई समझा भी तो मफ़्हूम नया माँगे है