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अनवर देहलवी

1847 - 1885 | दिल्ली, भारत

उत्तर-क्लासिकी शायर, ज़ौक़ और ग़ालिब के शिष्य अपने सर्वाधिक लोकप्रिय शेरों के लिए प्रसिद्ध

उत्तर-क्लासिकी शायर, ज़ौक़ और ग़ालिब के शिष्य अपने सर्वाधिक लोकप्रिय शेरों के लिए प्रसिद्ध

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मैं समझा आप आए कहीं से

पसीना पोछिए अपनी जबीं से

शर्म भी इक तरह की चोरी है

वो बदन को चुराए बैठे हैं

सूरत छुपाइए किसी सूरत-परस्त से

हम दिल में नक़्श आप की तस्वीर कर चुके

उन से हम लौ लगाए बैठे हैं

आग दिल में दबाए बैठे हैं

नींद का काम गरचे आना है

मेरी आँखों में पर नहीं आती

किस सोच में हैं आइने को आप देख कर

मेरी तरफ़ तो देखिए सरकार क्या हुआ

मिट्टी ख़राब है तिरे कूचे में वर्ना हम

अब तक तो जिस ज़मीं पे रहे आसमाँ रहे

वो जो गर्दन झुकाए बैठे हैं

हश्र क्या क्या उठाए बैठे हैं

मिरी नुमूद से पैदा है रंग-ए-नाकामी

पिसा हुआ हूँ किसी के हिना लगाने का

कुछ ख़बर होती तो मैं अपनी ख़बर क्यूँ रखता

ये भी इक बे-ख़बरी थी कि ख़बर-दार रहा

पी भी जा शैख़ कि साक़ी की इनायत है शराब

मैं तिरे बदले क़यामत में गुनहगार रहा

हश्र को मानता हूँ बे-देखे

हाए हंगामा उस की महफ़िल का

बे-तरह पड़ती है नज़र उन की

ख़ैर दिल की नज़र नहीं आती

गोया कि सब ग़लत हैं मिरी बद-गुमानियाँ

देखे तो कोई शक्ल तुम्हारी हया के साथ

मैं गिरफ़्तार-ए-वफ़ा हूँ छुट के जाऊँगा कहाँ

बाल बाँधा चोर हूँ हर तार-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार का

हर शय को इंतिहा है यक़ीं है कि वस्ल हो

अर्सा बहुत खिंचा है मिरी इंतिज़ार का

नाकामी-ए-विसाल का पैग़ाम है मुझे

शीरीं का ज़िक्र भी करो कोहकन के साथ

क़ामत ही लिखा हम ने सदा जा-ए-क़यामत

क़ामत ने भुलाया तिरे इम्ला-ए-क़यामत

नज़र आए क्या मुझ से फ़ानी की सूरत

कि पिन्हाँ हूँ दर्द-ए-निहानी की सूरत

अल्लाह-रे फ़र्त-ए-शौक़-ए-असीरी की शौक़ में

पहरों उठा उठा के सलासिल को देखना

थक के बैठे हो दर-ए-सौम'अ पर क्या 'अनवर'

दो-क़दम और कि ये ख़ाना-ए-ख़ुम्मार रहा

'अनवर' ने बदले जान के ली जिंस-ए-दर्द-ए-दिल

और इस पे नाज़ ये कि ये सौदा गिराँ था

फेंकिए क्यूँ मय-ए-नाक़िस साक़ी

शैख़-साहिब की ज़ियाफ़त ही सही

कैसी हया कहाँ की वफ़ा पास-ए-ख़ल्क़ क्या

हाँ ये सही कि आप को आना यहाँ था

कमर बाँधी है तौबा तोड़ने पर

इलाही ख़ैर अज़्म-ए-नातवाँ की

गरचे क्या कुछ थे मगर आप को कुछ भी गिना

इश्क़ बरहम-ज़न-ए-काशाना-ए-पिंदार रहा