अर्पित शर्मा अर्पित
ग़ज़ल 24
अशआर 1
मैं मरीज़ हूँ तिरे हिज्र का ज़रा हाथ में मिरा हाथ ले
तू ग़मों का मेरे इलाज कर मिरी बात सुन तू अभी न जा
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere