Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

आसिम नदीम आसी के शेर

391
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

हुसैन आज भी क़ाएम है अपनी सूरत पर

यज़ीद चेहरे बदलता है हर ज़माने में

दोस्त-दारी के सलीक़े से बहुत वाक़िफ़ हूँ

अब मुझे हाथ मिलाने का हुनर आता है

तुझे छू कर मुझे कैसा लगेगा

हवा के हाथ बन कर सोचता हूँ

तुम उन के हात पे सिक्के नहीं दिए रक्खो

ये अंधे लोग हैं और रौशनी के भूके हैं

इक यक़ीं-परवर गुमाँ और इक हयात-आमेज़ ख़्वाब

जैसे कोई आएगा और उलझनें ले जाएगा

जल रहा है जो लब-ए-बाम अभी एक चराग़

बुझ गया ये भी तो फिर रात मुकम्मल होगी

हमारा जिस्म तो फिर जिस्म ठहरा

दराड़ें ऐब हैं दीवार में भी

मिरे ख़मीर से ये काएनात उठाते हुए

उसे ग़ुरूर बहुत था मुझे बनाते हुए

आग पानी भी कभी एक हुए देखे हैं

आतिश-ए-ज़ब्त लहू में भी नहीं हल होगी

उजालों के किसी अवतार ही से जा के पूछो

जिसे सूरज कहा जाता है वो सूरज कहाँ है

ज़मीं के मालिक-ओ-मुख़्तार की सुन्नत समझ कर

खड़ावें पहन लीं और बकरियाँ रक्खी हुई हैं

तपते सहरा ख़ून पिएँगे चढ़ता सूरज ढल जाएगा

बैठी हुई है जिस में सकीना आज वो ख़ेमा जल जाएगा

कोशिश का इक तवील सफ़र था और उस के बा'द

पानी की एक बूँद से पत्थर भी फट गए

उजाड़ रात में रह कर हवा के होते हुए

कोई तो है जो चराग़ों की बात करता है

हमारी कारोबारी ज़िंदगी का कुल असासा

ये कुछ सिक्के हैं और कुछ पर्चियाँ रक्खी हुई हैं

वो क्या कि जिस को मयस्सर है मुस्तक़िल होना

सरिश्त-ए-ज़ख़्म में शामिल है मुंदमिल होना

वही जिन चादरों को दश्त में खींचा गया था

तबर्रुक में ये उन की धज्जियाँ रक्खी हुई हैं

मैं ने उस हद से गुज़रने की बहुत कोशिश की

जिस जगह रंग से तस्वीर अलग होती है

झाड़ कर हम रेत अपने पाँव से

बोटियाँ चुनते रहे सहराओं से

Recitation

Jashn-e-Rekhta | 8-9-10 December 2023 - Major Dhyan Chand National Stadium, Near India Gate - New Delhi

GET YOUR PASS
बोलिए