ग़ज़ल 21

शेर 19

पाँव उस के भी नहीं उठते मिरे घर की तरफ़

और अब के रास्ता बदला हुआ मेरा भी है

देख कर कि तिरे हिज्र में भी ज़िंदा हैं

तुझ से बिछड़े थे तो लगता था कि मर जाएँगे

गुज़रते जा रहे हैं क़ाफ़िले तू ही ज़रा रुक जा

ग़ुबार-ए-राह तेरे साथ चलना चाहता हूँ मैं

यही नहीं कि किसी याद ने मलूल किया

कभी कभी तो यूँही बे-सबब भी रोए हैं

ख़ता ये थी कि मैं आसानियों का तालिब था

सज़ा ये है कि मिरा तीशा-ए-हुनर भी गया

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