ग़ज़ल 21

शेर 19

पाँव उस के भी नहीं उठते मिरे घर की तरफ़

और अब के रास्ता बदला हुआ मेरा भी है

गुज़रते जा रहे हैं क़ाफ़िले तू ही ज़रा रुक जा

ग़ुबार-ए-राह तेरे साथ चलना चाहता हूँ मैं

देख कर कि तिरे हिज्र में भी ज़िंदा हैं

तुझ से बिछड़े थे तो लगता था कि मर जाएँगे

पुस्तकें 607

Aab-e-Kausar

 

 

Aadab-e-Niswan

 

 

Aag Ke Pas Baithi Aurat

 

2010

Aaina-e-Masoodi

Tareekh-e-Syed Salar Masood Ghazi

1937

Aaina-e-Talmeehat

 

1934

Aatish Kada

 

 

Abdul Majid Dariyabadi

 

1991

Adab-e-Zarrin

 

1933

Afkar-e-Safi Aurangabadi

 

2004

Afsana Nigari

 

1935

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