असलम महमूद

ग़ज़ल 21

शेर 19

देख कर कि तिरे हिज्र में भी ज़िंदा हैं

तुझ से बिछड़े थे तो लगता था कि मर जाएँगे

ख़ता ये थी कि मैं आसानियों का तालिब था

सज़ा ये है कि मिरा तीशा-ए-हुनर भी गया

गुज़रते जा रहे हैं क़ाफ़िले तू ही ज़रा रुक जा

ग़ुबार-ए-राह तेरे साथ चलना चाहता हूँ मैं

पाँव उस के भी नहीं उठते मिरे घर की तरफ़

और अब के रास्ता बदला हुआ मेरा भी है

यही नहीं कि किसी याद ने मलूल किया

कभी कभी तो यूँही बे-सबब भी रोए हैं

पुस्तकें 3

Deewan-e-Waheed Natiya

 

 

Ishrat Dawaam

Sharah Rubaiyat Hakeem Umar Khayyam

1939

Shumara Number-005

1976

 

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