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असलम महमूद

कानपुर, भारत

ग़ज़ल 21

शेर 19

गुज़रते जा रहे हैं क़ाफ़िले तू ही ज़रा रुक जा

ग़ुबार-ए-राह तेरे साथ चलना चाहता हूँ मैं

यही नहीं कि किसी याद ने मलूल किया

कभी कभी तो यूँही बे-सबब भी रोए हैं

मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया

अजब था ख़्वाब कि मैं ख़्वाब ही में डर भी गया

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